क्या मकर संक्रांति पर देसी खिचड़ी या मॉडर्न डिटॉक्स बेहतर है? जानें डॉक्टर मीरा पाठक की राय
सारांश
Key Takeaways
- खिचड़ी एक संपूर्ण और पौष्टिक आहार है।
- यह डिटॉक्स डाइट के लिए एक बेहतरीन विकल्प है।
- खिचड़ी में अन्य दालों का उपयोग किया जा सकता है।
- यह हाइड्रेटिंग और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर है।
- खिचड़ी सभी उम्र के लिए फायदेमंद है।
नई दिल्ली, 14 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। मकर संक्रांति के अवसर पर उत्तर भारत के घरों में रसोई की खुशबू एक अलग ही अनुभव देती है। सर्दियों में गाजर, मटर, गोभी और विभिन्न दालों से तैयार की गई गरमागरम खिचड़ी इस पर्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। खिचड़ी केवल एक स्वादिष्ट भोजन नहीं है, बल्कि इसके पीछे स्वास्थ्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू भी हैं।
जनवरी का महीना ऐसा समय होता है जब लोग शादी, पार्टी, त्योहारों और भारी भोजन के बाद अपने रूटीन में वापसी की कोशिश करते हैं। इस समय शरीर स्वाभाविक रूप से हल्के, साधारण और ग्राउंडिंग भोजन की ओर प्रवृत्त होता है। यही कारण है कि खिचड़ी जैसी डिश इस समय हमें सबसे अधिक सुकून प्रदान करती है।
इस विषय पर भंगेल सीएचसी की वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी और गायनेकोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. मीरा पाठक ने राष्ट्र प्रेस से विशेष बातचीत की। उन्होंने खिचड़ी के स्वास्थ्य लाभों को सरल भाषा में समझाया। उनका कहना है कि आजकल लोगों में यह धारणा बन गई है कि खिचड़ी केवल बीमार लोगों का खाना है, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है।
डॉ. मीरा बताती हैं कि खिचड़ी एक प्राचीन आयुर्वेदिक डाइट है और इसे एक संपूर्ण आहार के रूप में देखा जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और आवश्यक अमीनो एसिड्स का सही संतुलन होता है। दाल में उपस्थित लाइसीन और चावल में मौजूद मिथिओनीन जब मिलते हैं, तो एक कंप्लीट प्रोटीन का निर्माण करते हैं।
यदि हम डिटॉक्स डाइट की बात करें, तो खिचड़ी शायद सबसे बेहतरीन और सुरक्षित विकल्प है। डॉ. मीरा के अनुसार, खिचड़ी को पचाना आसान होता है और यह शरीर तथा मस्तिष्क को एक प्रकार के 'सॉफ्ट रीसेट' की अनुभूति कराती है। जब हम कुछ दिनों तक साधारण और आसानी से पचने वाला खाना लेते हैं, तो हमारी आंतों, जिगर और तंत्रिका तंत्र को आराम मिलता है और पुनः प्राप्ति का समय मिलता है। यही कारण है कि डिटॉक्स के लिए खिचड़ी को इतना प्रभावी माना जाता है।
खिचड़ी का एक और बड़ा फायदा यह है कि यह धीरे-धीरे ऊर्जा प्रदान करती है। इससे शुगर लेवल में अचानक वृद्धि नहीं होती, जैसा कि आजकल के जूस डाइट या आधुनिक डिटॉक्स ड्रिंक्स में देखा जाता है। डॉ. मीरा का कहना है कि जूस, कोम्बुचा या प्रोबायोटिक सप्लीमेंट्स की तुलना में खिचड़ी एक अधिक संतुलित और विश्वसनीय विकल्प है, क्योंकि इसमें पोषण का कोई अभाव नहीं होता।
इसके अलावा, खिचड़ी में हाइड्रेटिंग और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण भी होते हैं। यदि शरीर में कहीं सूजन, थकान या आंतरिक 'वेयर एंड टियर' है, तो खिचड़ी उसे ठीक करने में मदद करती है। यही कारण है कि इसे बीमारी, कमजोरी या रिकवरी के समय में सेवन करने की सलाह दी जाती है। शायद इसी कारण इसे केवल “बीमारों का खाना” मान लिया गया है, जबकि यह हर उम्र और हर मौसम के लिए लाभकारी है।
खिचड़ी की सबसे आकर्षक विशेषता इसकी विविधता है। इसमें चावल की जगह मिलेट्स का उपयोग किया जा सकता है, मूंग दाल के साथ अन्य दालों का प्रयोग किया जा सकता है और इसमें सब्जियों, पनीर या शुद्ध घी को मिलाकर इसे और भी पौष्टिक बनाया जा सकता है। यह हमारी पारंपरिक भारतीय समझ पर आधारित है, जिसे आज की मॉडर्न साइंस भी पूरी तरह समर्थन करती है।