प्रसव के बाद दूध कम बनने की समस्या? आयुर्वेद के ये 5 प्राकृतिक उपाय दिलाएंगे राहत

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प्रसव के बाद दूध कम बनने की समस्या? आयुर्वेद के ये 5 प्राकृतिक उपाय दिलाएंगे राहत

सारांश

प्रसव के बाद दूध कम बनने की समस्या से परेशान माताओं के लिए आयुर्वेद में शतावरी, मेथी, जीरा और यष्टिमधु जैसे प्राकृतिक उपाय बताए गए हैं। मानसिक शांति, उचित पोषण और नियमित स्तनपान से यह समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है।

Key Takeaways

  • प्रसव के बाद दूध कम बनना एक सामान्य समस्या है जो शरीर, मन और आहार के असंतुलन से होती है।
  • मानसिक तनाव और नींद की कमी दूध उत्पादन को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं।
  • शतावरी, मेथी, जीरा, लहसुन और यष्टिमधु आयुर्वेद में दूध बढ़ाने की प्रमुख औषधियां हैं।
  • हर 2-3 घंटे पर नियमित स्तनपान कराना दूध उत्पादन बढ़ाने का सबसे प्रभावी तरीका है।
  • WHO जन्म के पहले छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाने की सिफारिश करता है।
  • स्थिति में सुधार न होने पर डॉक्टर की सलाह पर फॉर्मूला मिल्क का विकल्प अपनाया जा सकता है।

नई दिल्ली, 22 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। प्रसव के बाद स्तनपान में कमी एक ऐसी समस्या है जिससे देश में लाखों नई माताएं जूझती हैं — बच्चे का पेट न भरना, उसका वजन धीरे बढ़ना और मां की बेचैनी। आयुर्वेद इस समस्या को शरीर, मन और आहार के असंतुलन का परिणाम मानता है और इसके लिए सरल, प्राकृतिक एवं प्रभावी समाधान सुझाता है।

आयुर्वेद की दृष्टि में दूध उत्पादन की प्रक्रिया

आयुर्वेद के अनुसार, स्तनपान यानी दूध बनने की प्रक्रिया केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और पोषण संबंधी तीनों स्तरों पर निर्भर करती है। प्रसव के तुरंत बाद महिला का शरीर अत्यंत कमजोर अवस्था में होता है और इस दौरान यदि उचित पोषण, पर्याप्त विश्राम और मानसिक शांति न मिले, तो दूध उत्पादन प्रभावित होता है।

गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी जन्म के पहले छह महीनों तक शिशु को केवल मां का दूध पिलाने की सिफारिश करता है। ऐसे में यदि दूध की कमी हो, तो यह शिशु के समग्र विकास पर सीधा असर डालती है।

दूध कम बनने के प्रमुख कारण

मानसिक तनाव और चिंता दूध उत्पादन को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं। जब मां मानसिक रूप से तनावग्रस्त होती है, तो शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ता है जो दूध बनाने वाले हार्मोन प्रोलैक्टिन को बाधित करता है।

नींद की कमी, अत्यधिक उपवास और पानी की अपर्याप्त मात्रा भी इस समस्या के बड़े कारण हैं। आयुर्वेद के अनुसार, यदि मां का शरीर भीतर से सूखा और थका हुआ हो, तो दूध की धारा स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है।

इसके अलावा, बच्चे को नियमित रूप से स्तनपान न कराना भी एक बड़ा कारण है। जितनी बार बच्चा दूध पीता है, उतना ही शरीर को संकेत मिलता है कि और दूध बनाना है।

शिशु में दिखने वाले लक्षण

यदि शिशु का वजन धीरे-धीरे बढ़ रहा हो, वह बार-बार रोता हो, पेशाब कम करता हो या कमजोर दिखे — ये सभी संकेत हैं कि उसे पर्याप्त दूध नहीं मिल रहा। कुछ मामलों में शिशु को कब्ज की समस्या भी हो सकती है।

मां को भी स्वयं महसूस हो सकता है कि स्तन पहले जितने भरे हुए नहीं लगते या बच्चा दूध पीने के बाद भी संतुष्ट नहीं दिखता।

आयुर्वेदिक उपाय — प्राकृतिक और प्रभावी

शतावरी को आयुर्वेद में सर्वश्रेष्ठ गैलेक्टागॉग (दूध बढ़ाने वाली औषधि) माना गया है। इसे दूध या घी के साथ लेने से स्तनपान में उल्लेखनीय सुधार होता है।

मेथी के बीज, जीरा, लहसुन और यष्टिमधु भी दूध उत्पादन को प्राकृतिक रूप से बढ़ाने में सहायक हैं। इन्हें भोजन में शामिल करना या काढ़े के रूप में लेना लाभदायक रहता है।

आहार में हल्का, गर्म, पौष्टिक और तरल भोजन लेना जरूरी है। दूध, घी, दाल का पानी, हरी सब्जियों का सूप और पर्याप्त मात्रा में जल — ये सभी शरीर को अंदर से पोषित करते हैं और दूध उत्पादन को बढ़ावा देते हैं।

पर्याप्त नींद और विश्राम उतना ही आवश्यक है जितना औषधि। शरीर जितना अधिक रिलैक्स रहेगा, हार्मोन उतने ही संतुलित रहेंगे और दूध उत्पादन उतना बेहतर होगा।

नियमित स्तनपान ही सबसे बड़ा समाधान

विशेषज्ञों के अनुसार, हर 2-3 घंटे पर बच्चे को स्तनपान कराना सबसे प्रभावी उपाय है। इससे शरीर को निरंतर संकेत मिलता है और दूध उत्पादन धीरे-धीरे स्वतः बढ़ने लगता है। शुरुआती दो-तीन सप्ताह में यह प्रक्रिया पूरी तरह स्थापित हो जाती है।

यदि आयुर्वेदिक उपायों और नियमित स्तनपान के बाद भी स्थिति में सुधार न हो और शिशु का वजन लगातार कम हो रहा हो, तो किसी अनुभवी चिकित्सक की सलाह पर सप्लीमेंट या फॉर्मूला मिल्क का सहारा लिया जा सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में आयुर्वेदिक प्रसवोत्तर देखभाल को मुख्यधारा की स्वास्थ्य प्रणाली में और अधिक शामिल किया जाना चाहिए, ताकि नई माताओं को समग्र सहायता मिल सके।

Point of View

जबकि WHO के अनुसार छह माह तक केवल मां का दूध शिशु के लिए सर्वोत्तम है। विडंबना यह है कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में प्रसवोत्तर मानसिक और पोषण संबंधी सहायता अभी भी हाशिए पर है। आयुर्वेद सदियों से इन समाधानों को जानता है, लेकिन इन्हें मुख्यधारा की स्वास्थ्य नीति में शामिल करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए। यह केवल एक व्यक्तिगत स्वास्थ्य मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शिशु स्वास्थ्य नीति की विफलता का प्रतिबिंब भी है।
NationPress
29/04/2026

Frequently Asked Questions

प्रसव के बाद दूध कम क्यों बनता है?
प्रसव के बाद मानसिक तनाव, नींद की कमी, अपर्याप्त पोषण और पानी की कमी दूध उत्पादन को प्रभावित करते हैं। आयुर्वेद के अनुसार शरीर, मन और आहार तीनों का संतुलन बिगड़ने पर यह समस्या होती है।
दूध बढ़ाने के लिए आयुर्वेदिक उपाय क्या हैं?
शतावरी, मेथी, जीरा, लहसुन और यष्टिमधु आयुर्वेद में दूध बढ़ाने के प्रमुख उपाय हैं। इनके साथ गर्म-पौष्टिक भोजन, पर्याप्त पानी और मानसिक शांति भी जरूरी है।
कैसे पता चलेगा कि बच्चे को पर्याप्त दूध मिल रहा है?
यदि बच्चे का वजन नियमित रूप से बढ़ रहा है, वह पर्याप्त पेशाब कर रहा है और दूध पीने के बाद शांत रहता है, तो समझें दूध पर्याप्त है। वजन न बढ़ना और बार-बार रोना कमी के संकेत हो सकते हैं।
क्या नियमित स्तनपान से दूध उत्पादन बढ़ता है?
हां, हर 2-3 घंटे पर बच्चे को स्तनपान कराने से शरीर को अधिक दूध बनाने का संकेत मिलता है। शुरुआती हफ्तों में नियमित फीडिंग से दूध उत्पादन स्वतः बेहतर होने लगता है।
क्या दूध कम होने पर फॉर्मूला मिल्क देना सही है?
यदि आयुर्वेदिक उपायों और नियमित स्तनपान के बाद भी शिशु का वजन नहीं बढ़ रहा, तो डॉक्टर की सलाह पर फॉर्मूला मिल्क का सहारा लिया जा सकता है। यह निर्णय हमेशा चिकित्सक के परामर्श से लेना चाहिए।
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