वैश्विक तनाव के बीच आईएमईसी: भारत के लिए सुरक्षा और आर्थिक मजबूती का नया मार्ग
सारांश
Key Takeaways
- आईएमईसी एक प्रमुख आर्थिक विकल्प है जो भारत की सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है।
- बाब अल-मंडेब स्ट्रेट में अस्थिरता का गंभीर प्रभाव हो सकता है।
- भारत ने व्यापार और ऊर्जा सप्लाई को बनाए रखने के लिए रणनीति बनाई है।
- आईएमईसी से संवेदनशील समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम होगी।
- नई व्यापारिक रास्तों की तलाश आवश्यक है।
नई दिल्ली, 14 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत के पास इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (आईएमईसी) को 'राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा के लिए एक मजबूत विकल्प' के रूप में देखने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान वैश्विक तनाव और अस्थिरता के दौर में भारत अपने साझेदार देशों पर जल्दी से रेल समझौतों को लागू करने, कस्टम और मानकों को एक समान बनाने, और ऊर्जा तथा डिजिटल कॉरिडोर के नियमों को स्पष्ट रूप से तय करने का दबाव डाल सकता है।
नई दिल्ली स्थित 'इंटरनेशनल सेंटर फॉर पीस स्टडीज' की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और पर्याप्त फंडिंग उपलब्ध हो, तो आईएमईसी भारत और यूरोप के बीच व्यापार और ऊर्जा के लिए एक वैकल्पिक मार्ग बना सकता है, जो मौजूदा और भविष्य के संकटों का सामना कर सके।
रिपोर्ट में बताया गया है कि बाब अल-मंडेब स्ट्रेट (एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग) अब एक बड़ा भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र बन गया है। यहां हूथी और ईरान से जुड़ी गतिविधियां वैश्विक व्यापार, ऊर्जा, और इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए खतरा
भारत के लिए यह विशेष चिंता का विषय है, क्योंकि उसका लगभग 95 प्रतिशत व्यापार समुद्री मार्गों से होता है। ऐसी अस्थिरता देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएमईसी एक महत्वपूर्ण समाधान बन सकता है। यह जमीन और समुद्र दोनों रास्तों को जोड़कर एक ऐसा विकल्प प्रदान करता है, जो संवेदनशील समुद्री रास्तों पर निर्भरता को कम करता है।
इसके साथ ही, रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि अल-मंडेब स्ट्रेट में भी स्ट्रेट होर्मुज जैसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो सप्लाई चेन और ऊर्जा आपूर्ति को गंभीर खतरा हो सकता है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच, रिपोर्ट में कहा गया है कि यमन के हूथियों (जिन्हें ईरान का समर्थन प्राप्त है) ने इजरायल पर मिसाइल हमले किए हैं। 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष के बाद, ईरान ने खाड़ी देशों को निशाना बनाया और स्ट्रेट को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, जिससे दुनिया में ऊर्जा संकट उत्पन्न हुआ। इसी तरह, दक्षिणी लेबनान में इजरायल और हिज़्बुल्लाह के बीच भी संघर्ष जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हूथी इस युद्ध में पूरी तरह शामिल होते हैं, तो अल-मंडेब स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते पर बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है, जो एशिया, अफ्रीका, और यूरोप को जोड़ता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि गाजा युद्ध के बाद हूथियों द्वारा लगाए गए अवरोध के बावजूद, भारत ने अपने व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को संभाल लिया। इसके लिए भारत ने रास्ते बदलना, अतिरिक्त खर्च उठाना, नौसेना की मौजूदगी बढ़ाना, और पहले से तैयारी जैसे कदम उठाए।
भारत ने एक संतुलित रणनीति अपनाई; वह अमेरिका के नेतृत्व वाले ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्डियन में शामिल नहीं हुआ, लेकिन उसने अपनी नौसेना की निगरानी और गतिविधियां अदन की खाड़ी और उत्तरी अरब सागर में काफी बढ़ा दीं।
अंत में रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह की समुद्री अस्थिरता के बाद अब नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं। जैसे क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग बढ़ाना, बीमा जोखिम को साझा करना, और नए व्यापारिक रास्ते विकसित करना। इनमें आईएमईसी को एक मध्यम अवधि के मजबूत विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।