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ईरानी सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि इलाही का बयान: युद्ध को बताया 'आशीर्वाद', अमेरिका पर साधा निशाना

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ईरानी सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि इलाही का बयान: युद्ध को बताया 'आशीर्वाद', अमेरिका पर साधा निशाना

सारांश

ईरान के सर्वोच्च नेता के भारत-स्थित प्रतिनिधि इलाही ने मध्य पूर्व के हालिया युद्ध को 'आशीर्वाद' कहकर एक बड़ा बयान दिया। उनका तर्क है कि इस संघर्ष ने अरब देशों को अमेरिकी सुरक्षा-निर्भरता की खोखली हकीकत दिखाई और ईरान के साथ क्षेत्रीय एकजुटता का रास्ता खोला।

मुख्य बातें

अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने 2 मई 2026 को नई दिल्ली में मध्य पूर्व के युद्ध को 'आशीर्वाद' करार दिया।
अरब देशों को अमेरिकी हथियारों पर सालाना लगभग 500 बिलियन डॉलर खर्च करने पड़ते थे, फिर भी सुरक्षा नहीं मिली।
इलाही ने कहा कि ईरान ने युद्ध के दौरान किसी पड़ोसी देश पर हमला नहीं किया, केवल आत्मरक्षा की।
हिज़्बुल्लाह को संकट की जड़ बताने की धारणा को खारिज करते हुए इज़रायल को असल कारण बताया।
सबरा और शतीला नरसंहार का उल्लेख करते हुए कहा कि यह हिज़्बुल्लाह के अस्तित्व से पहले हुआ था।
लेबनान का कुछ हिस्सा 50 साल से अधिक समय से इज़रायल के कब्जे में होने का दावा किया।

भारत में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने 2 मई 2026 को नई दिल्ली में एक विशेष बातचीत के दौरान मध्य पूर्व के हालिया युद्ध को "एक तरह का आशीर्वाद" करार दिया। उन्होंने कहा कि इस संघर्ष ने अरब देशों को अमेरिका पर निर्भरता की असलियत से रूबरू कराया और ईरान तथा उसके पड़ोसी देशों के बीच संबंध अब पहले से कहीं अधिक मज़बूत होंगे।

युद्ध को 'आशीर्वाद' क्यों बताया

इलाही ने कहा, "मुझे लगता है कि यह युद्ध भी एक आशीर्वाद था। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि अरब देश भी इससे खुश हैं।" उनके अनुसार, अरब देशों को प्रतिवर्ष अमेरिका से हथियार खरीदने के लिए विवश किया जाता था और इस पर लगभग 500 बिलियन डॉलर सालाना खर्च होते थे — फिर भी उन्हें इन हथियारों से कोई ठोस सुरक्षा नहीं मिली।

इलाही ने आगे कहा कि कुछ अरब देशों के शासकों को अमेरिका को महंगे विमान तक 'उपहार' के रूप में देने पड़े। उन्होंने नाम लेने से परहेज किया, लेकिन इसे अमेरिकी दबाव का प्रतीक बताया।

अमेरिका की भूमिका पर सवाल

इलाही के अनुसार, इस युद्ध ने अरब देशों को यह एहसास दिलाया कि "अमेरिका उनकी रक्षा नहीं कर सकता, उनके लिए शांति नहीं ला सकता और न ही सुरक्षा दे सकता है।" उन्होंने यह भी बताया कि एक पश्चिमी देश के विदेश मंत्री ने एक साक्षात्कार में कहा कि वे अमेरिका के साथ अपने संबंधों की नीति बदलने वाले हैं।

इलाही ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्वयं अरब देशों से कहा था, "अगर मैं न हूँ, तो तुम एक हफ्ता भी नहीं टिक पाओगे।" उन्होंने इस लहजे को "काफी रूखा" बताया।

ईरान और पड़ोसी देशों के रिश्ते

इलाही ने स्पष्ट किया कि ईरान का अपने पड़ोसी देशों से कोई विवाद नहीं है। उन्होंने कहा, "इस युद्ध के दौरान भी ईरान ने कभी अपने पड़ोसी देशों पर हमला नहीं किया। उसने सिर्फ अपनी रक्षा की।" उनके अनुसार, मध्य पूर्व के देशों को अब यह समझ आ गया है कि उन्हें आपसी समस्याएँ खुद मिलकर सुलझानी होंगी।

हिज़्बुल्लाह और इज़रायल पर इलाही का रुख

इलाही ने हिज़्बुल्लाह को लेकर प्रचलित धारणाओं को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि इस्लामिक रिपब्लिक बनने से पहले भी लेबनान का आधा हिस्सा इज़रायल के कब्जे में था और इज़रायली सेना बेरूत तक पहुँच गई थी। उन्होंने सबरा और शतीला में हुए नरसंहार का उल्लेख करते हुए कहा कि यह एरियल शेरोन के समय में हुआ था और हिज़्बुल्लाह के अस्तित्व में आने से पहले हुआ था।

इलाही ने कहा, "हिज़्बुल्लाह बना ही इसलिए था क्योंकि वह इज़रायल को अपने देश से बाहर निकालना चाहता था और उन्होंने ऐसा कर भी दिखाया।" उन्होंने यह भी कहा कि हिज़्बुल्लाह के सदस्य ईरानी नहीं, बल्कि लेबनानी हैं — जिनमें शिया, सुन्नी और ईसाई सभी शामिल हैं। उनके अनुसार, "असल संकट हिज़्बुल्लाह की वजह से नहीं, बल्कि इज़रायल की वजह से है।"

इलाही ने यह भी कहा कि आज भी लेबनान का कुछ हिस्सा 50 साल से अधिक समय से इज़रायल के कब्जे में है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब मध्य पूर्व में तनाव का वातावरण बना हुआ है और भारत की विदेश नीति पर भी इसके प्रभावों की चर्चा हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि सीधे वैचारिक टकराव की भाषा में है — और यही इसे महत्वपूर्ण बनाता है। नई दिल्ली में बैठकर अमेरिकी प्रभाव को 'विफल' घोषित करना और युद्ध को 'आशीर्वाद' कहना, ईरान की उस रणनीति का हिस्सा है जो पश्चिम-विरोधी कथा को क्षेत्रीय वैधता देने की कोशिश करती है। हिज़्बुल्लाह पर उनका तर्क — कि वह प्रतिक्रियावादी संगठन है, आक्रामक नहीं — एकतरफा है और इज़रायली पक्ष की जटिलताओं को नज़रअंदाज़ करता है। भारत में ऐसे बयान देना यह भी दर्शाता है कि ईरान दक्षिण एशिया में अपनी कूटनीतिक उपस्थिति को सक्रिय रूप से बढ़ाना चाहता है।
RashtraPress
7 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अब्दुल माजिद हकीम इलाही कौन हैं?
अब्दुल माजिद हकीम इलाही भारत में ईरान के सर्वोच्च नेता के आधिकारिक प्रतिनिधि हैं। उन्होंने 2 मई 2026 को नई दिल्ली में एक विशेष बातचीत के दौरान मध्य पूर्व की राजनीति, अमेरिका और हिज़्बुल्लाह पर विस्तृत बयान दिया।
इलाही ने युद्ध को 'आशीर्वाद' क्यों बताया?
इलाही के अनुसार, इस युद्ध ने अरब देशों को यह समझाया कि अमेरिका उनकी वास्तविक सुरक्षा नहीं कर सकता, जबकि वे सालाना लगभग 500 बिलियन डॉलर हथियारों पर खर्च करते थे। उनका मानना है कि इससे मध्य पूर्व में क्षेत्रीय एकजुटता की नींव पड़ी है।
इलाही ने हिज़्बुल्लाह के बारे में क्या कहा?
इलाही ने कहा कि हिज़्बुल्लाह मध्य पूर्व संकट की जड़ नहीं है, बल्कि यह इज़रायली कब्जे की प्रतिक्रिया में बना संगठन है। उन्होंने तर्क दिया कि सबरा और शतीला नरसंहार हिज़्बुल्लाह के अस्तित्व में आने से पहले हुआ था।
ईरान और अरब देशों के रिश्ते अब कैसे होंगे?
इलाही के अनुसार, इस युद्ध के बाद अरब देशों को एहसास हुआ है कि उन्हें अपनी समस्याएँ खुद मिलकर सुलझानी होंगी। उनका दावा है कि ईरान और उसके पड़ोसी देशों के बीच संबंध अब पहले से कहीं अधिक मज़बूत होंगे।
इलाही ने अमेरिका की भूमिका पर क्या कहा?
इलाही ने कहा कि अमेरिका ने अरब देशों पर हथियार खरीदने का दबाव बनाया और उन्हें कहा कि उसके बिना वे एक हफ्ता भी नहीं टिकेंगे। उनके अनुसार, एक पश्चिमी देश के विदेश मंत्री ने भी अमेरिका के साथ संबंधों की नीति बदलने का संकेत दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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