क्या पाकिस्तान और सऊदी अरब की रक्षा साझेदारी से भू-राजनीतिक संकट बढ़ सकता है?
सारांश
Key Takeaways
- पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग में वृद्धि हो रही है।
- चीन अपनी रक्षा निर्यात रणनीति को पुनर्जीवित कर रहा है।
- यूरोपीय संघ की मानवाधिकार सुरक्षा कमजोर हो सकती है।
- यह समझौता भू-राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
- अमेरिका की रक्षा नीति पर गंभीर निहितार्थ हो सकते हैं।
इस्लामाबाद, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान और सऊदी अरब के प्रमुख सैन्य अधिकारियों के बीच हाल ही में संपन्न चर्चाएँ रक्षा सहयोग को मजबूती देने के संकेत पेश करती हैं। यह कदम मध्य पूर्व और अन्य क्षेत्रों में भू-राजनीतिक समीकरणों में बदलाव को दर्शाता है। पहली नजर में यह एक साधारण हथियार सौदा प्रतीत हो सकता है, लेकिन दरअसल यह रणनीतिक गठबंधनों के पुनर्संतुलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, एक रिपोर्ट में कहा गया है।
रिपोर्टों के अनुसार, रियाद पाकिस्तान को दिए गए लगभग 2 अरब डॉलर के ऋण को हथियार सौदे में बदलने पर विचार कर रहा है, जिसमें पाकिस्तान और चीन द्वारा संयुक्त रूप से विकसित जेएफ-17 लड़ाकू विमान शामिल हो सकते हैं। इससे पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा, वहीं सऊदी अरब को पश्चिमी देशों के महंगे विमानों की तुलना में एक कम लागत का विकल्प मिलेगा।
हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि यह सौदा चीन की व्यापक रणनीति को भी उजागर करता है। बीजिंग उन बाजारों में वापसी करना चाहता है, जहां उसकी रक्षा निर्यात में पहले सफलता नहीं मिली। इस संदर्भ में, पाकिस्तान को एक राजनीतिक रूप से स्वीकार्य मध्यस्थ के रूप में उपयोग किया जा रहा है। एशियाई मीडिया इसे “कर्ज के बदले हथियार” (डेट-फॉर-आर्म्स) मॉडल के रूप में देखता है।
यूरोपीय मीडिया स्रोत ईयू रिपोर्टर के अनुसार, “यह समझौता एक पारंपरिक कर्ज-बदले-हथियार सौदे जैसा प्रतीत होता है, लेकिन जेएफ-17 का निर्यात इतिहास गंभीर प्रश्न उठाता है। लगभग एक दशक पहले चीन ने इस विमान को कम लागत वाले बहुउद्देश्यीय फाइटर के रूप में बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार और सऊदी अरब जैसे देशों को पेश किया था, लेकिन इनमें से अधिकांश ने सौदे से दूरी बना ली।”
इस पृष्ठभूमि में, पाकिस्तान ने लीबिया, बांग्लादेश और अब सऊदी अरब के साथ संभावित रक्षा निर्यात सौदों को आगे बढ़ाया है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि पाकिस्तान खुद को मुस्लिम बहुल देशों के लिए एक रक्षा केंद्र के रूप में स्थापित करने की योजना बना रहा है और जेएफ-17 को चीन या रूस पर निर्भर हुए बिना एक “तटस्थ” विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
विश्लेषकों ने इसे चीन की “बैकडोर रणनीति” कहा है, जिससे वह राजनीतिक विरोध और प्रतिष्ठा के जोखिमों से बच सकता है। इसके लिए यूरोप के लिए चिंताजनक निहितार्थ हो सकते हैं। इस प्रकार के अप्रत्यक्ष हथियार निर्यात से यूरोपीय संघ की मानवाधिकार सुरक्षा में कमी आ सकती है।
ईयू रिपोर्टर के अनुसार, “अमेरिका के लिए भी इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाकर चीन अपनी रक्षा उपस्थिति को बढ़ा सकता है, बिना अमेरिका की ‘रेड लाइन्स’ को सीधे तौर पर छुए।”