फ्लाईदुबई FZ1073 हमले पर पाकिस्तान-तुर्की की चुप्पी, मक्का गठबंधन की साख दांव पर
सारांश
मुख्य बातें
फ्लाईदुबई की उड़ान एफजेड1073 पर हुए कथित हमले के बाद पाकिस्तान और तुर्की — दोनों देश, जो सऊदी अरब के साथ रक्षा प्रतिबद्धताएँ साझा करते हैं — ने इस घटना की सार्वजनिक निंदा करने से परहेज किया है, जिससे मक्का समझौते की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दुबई से तेल अवीव जा रहे इस विमान में 170 से अधिक यात्री सवार थे और कॉकपिट में कथित हमले के बाद विमान आपात स्थिति में आ गया था।
घटना का संक्षिप्त विवरण
फ्लाईदुबई की उड़ान एफजेड1073 दुबई से तेल अवीव जा रही थी, जब कॉकपिट में को-पायलट द्वारा कैप्टन पर कथित हमले के बाद विमान गहरे संकट में पड़ गया। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के अनुसार, यात्रियों और क्रू के हस्तक्षेप से पहले विमान तीस सेकंड से भी कम समय में लगभग 14,000 फीट नीचे गिर गया था। अंततः यह विमान सऊदी अरब के तबुक में सुरक्षित उतरा, जहाँ घायल कैप्टन और भयभीत यात्रियों को राहत मिली।
कथित हमलावर ओमान का नागरिक बताया जा रहा है, जबकि विमान को बचाने वाले कैप्टन भारतीय थे। यह उड़ान एक अमीराती एयरलाइन की थी और इसके अधिकांश यात्री इजरायली थे।
पाकिस्तान और तुर्की की चुप्पी
इटली के भू-राजनीतिक विशेषज्ञ और लेखक सर्जियो रेस्टेली ने 'द टाइम्स ऑफ इजरायल' में लिखा, 'कुछ पल ऐसे होते हैं जब चुप्पी ही कूटनीति होती है, कुछ ऐसे भी होते हैं जब चुप्पी एक राजनीतिक बयान बन जाती है।' उन्होंने रेखांकित किया कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब की 'हर तरह से' रक्षा करने का वादा किया है, जबकि तुर्की ने सऊदी अरब पर किसी भी सशस्त्र हमले को अपने ऊपर हमला मानने की प्रतिबद्धता जताई है।
इन दोनों देशों में से किसी ने भी नागरिक विमान पर हुए इस कथित हमले की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की। रेस्टेली के अनुसार, 'जाहिर है, जब हमलावर राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो, तो सामूहिक सुरक्षा की बात करना आसान होता है।'
मक्का समझौते की साख पर सवाल
रेस्टेली ने इस बात पर जोर दिया कि पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का समझौते का मकसद महज एक और क्षेत्रीय बयान जारी करना नहीं था। उन्होंने लिखा, 'अगर मक्का समझौते का मकसद सुरक्षा का एक गंभीर और नया ढाँचा तैयार करना है, तो इसके सदस्य आतंकवाद की अपनी परिभाषा को पीड़ितों की राष्ट्रीयता, विमान के गंतव्य या उस समय की कूटनीतिक संवेदनशीलता के आधार पर बदलने की इजाजत नहीं दे सकते।'
विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि सऊदी अरब इस्लाम की दो सबसे पवित्र मस्जिदों का संरक्षक है और तेजी से खुद को आधुनिक मुस्लिम जगत के राजनीतिक केंद्र के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इसलिए, मक्का के नाम पर बने इस गठबंधन का नैतिक दायित्व सामान्य रक्षा सहयोग से कहीं अधिक है।
निंदा न करने का निहितार्थ
रेस्टेली ने स्पष्ट किया कि नागरिक विमान को नष्ट करने की कोशिश की निंदा करने का अर्थ इजरायल को मान्यता देना, प्रधानमंत्री नेतन्याहू का समर्थन करना या फिलस्तीन के प्रति नीति बदलना नहीं है — यह केवल आतंकवाद को नकारने का एक बुनियादी कदम होता।
उन्होंने जोर देते हुए कहा, 'किसी गठबंधन की असली परीक्षा तब नहीं होती जब उसके सदस्य इस बात पर सहमत हों कि दुश्मन कौन है, बल्कि तब होती है जब सिद्धांतों पर कायम रहना मुश्किल हो जाता है।' आलोचकों का कहना है कि यह चुप्पी इन देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं और नैतिक प्रतिबद्धताओं के बीच की खाई को उजागर करती है।
आगे क्या होगा
यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव पहले से ही चरम पर है। गौरतलब है कि मक्का समझौते को क्षेत्रीय सुरक्षा का एक नया आधार-स्तंभ माना जा रहा था, लेकिन एफजेड1073 की घटना पर इसके सदस्य देशों की प्रतिक्रिया — या उसकी अनुपस्थिति — इस गठबंधन की व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित करती है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों की नजर अब इस बात पर है कि क्या सऊदी अरब अपने सहयोगियों से इस मामले पर स्पष्ट रुख अपनाने की माँग करेगा।