ट्रंप चाहते हैं शी-पुतिन के साथ त्रिपक्षीय बैठक, परमाणु निरस्त्रीकरण होगा मुख्य एजेंडा
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 20 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक त्रिपक्षीय शिखर बैठक करने के इच्छुक हैं, जिसमें परमाणु निरस्त्रीकरण को केंद्रीय एजेंडा बनाया जाए। व्हाइट हाउस से रवाना होने से पहले पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने यह भी कहा कि यह बैठक उनकी अगले महीने प्रस्तावित चीन यात्रा के दौरान हो सकती है। हालांकि, अभी तक किसी भी पक्ष ने इस बैठक की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
ट्रंप का रुख: यूक्रेन नहीं, परमाणु हथियार
ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा, 'मैं यह बैठक करने को तैयार हूं, लेकिन यूक्रेन के लिए नहीं। हम इसे परमाणु निरस्त्रीकरण पर बात करने के लिए करेंगे।' उनका यह बयान उन अटकलों को खारिज करता है जिनमें कहा जा रहा था कि रूस-यूक्रेन युद्ध इस संभावित बैठक का मुख्य विषय होगा। गौरतलब है कि यह टिप्पणी उनके 15 अक्टूबर के उस इंटरव्यू के बाद आई है जिसमें उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका पहले से ही रूस और चीन के साथ परमाणु निरस्त्रीकरण पर बातचीत कर रहा है।
APEC शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि
यह संभावित त्रिपक्षीय बैठक नवंबर में चीन के शेन्जेन में होने वाले एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन (APEC) शिखर सम्मेलन के इर्द-गिर्द आकार ले सकती है। रिपोर्टों के अनुसार, पुतिन ने APEC के दौरान अमेरिका, रूस और चीन के नेताओं की बैठक का प्रस्ताव दिया है। हालांकि, तीनों देशों ने न तो किसी साझा एजेंडे की पुष्टि की है और न ही परमाणु वार्ता की कोई समय-सारणी सामने आई है।
परमाणु हथियारों की असमान स्थिति
अमेरिका और रूस के पास दुनिया के सबसे बड़े परमाणु हथियार भंडार हैं। चीन पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से अपनी परमाणु क्षमता बढ़ा रहा है, हालांकि ट्रंप के अनुसार वह अभी भी दोनों महाशक्तियों से पीछे है। ट्रंप ने माना कि किसी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा, क्योंकि कम परमाणु भंडार होने के कारण चीन समान शर्तों वाली वार्ता में शामिल होने से हिचक सकता है।
चीन का पुराना विरोध
चीन पहले भी तीन देशों के बीच परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ता के प्रस्ताव को अस्वीकार कर चुका है। पिछले सप्ताह चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बार फिर यही रुख दोहराया कि मौजूदा समय में बीजिंग से ऐसी वार्ता में शामिल होने की अपेक्षा 'न तो उचित है और न ही व्यावहारिक।' उसका तर्क है कि उसका परमाणु भंडार अमेरिका और रूस से काफी छोटा है, इसलिए समान शर्तों पर बातचीत न्यायसंगत नहीं होगी।
New START के बाद की खाई और आगे का रास्ता
यह संभावित वार्ता ऐसे नाज़ुक दौर में सामने आई है जब न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी (New START) इस वर्ष की शुरुआत में समाप्त हो गई और उसके साथ ही अमेरिका तथा रूस पर परमाणु हथियारों की संख्या की कानूनी सीमाएं भी खत्म हो गईं। इस संधि के तहत दोनों देशों को अधिकतम 1,550 तैनात रणनीतिक परमाणु हथियार रखने की अनुमति थी। हथियार नियंत्रण विशेषज्ञों का कहना है कि नई संधि के अभाव में परमाणु शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डैरिल किम्बल के अनुसार, 'किसी भी सार्थक बातचीत के लिए ठोस प्रस्ताव और दीर्घकालिक कूटनीतिक प्रयास ज़रूरी होंगे।' यूक्रेन के अधिकारियों ने भी चिंता जताई है कि यदि उनके देश के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है, तो कीव की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। आने वाले हफ्तों में तीनों देशों के कूटनीतिक रवैये पर सभी की नज़रें टिकी रहेंगी।