क्या संसद परिसर में जगन्नाथ रथ के पहिए लगेंगे? पुजारी ने स्पीकर ओम बिरला की मंजूरी का किया स्वागत

सारांश
Key Takeaways
- जगन्नाथ रथ के पहिए संसद में स्थापित होंगे।
- ओम बिरला ने इस पहल को मंजूरी दी।
- यह ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देगा।
- पुजारियों का जोरदार स्वागत।
- संसद में भगवान जगन्नाथ की विरासत का प्रतिनिधित्व।
पुरी, 31 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। एक ऐतिहासिक निर्णय के तहत, भगवान जगन्नाथ के तीन रथ (नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन) के पहिए जल्द ही नई दिल्ली के संसद परिसर में स्थापित किए जाएंगे। लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी है।
यह पहल ओडिशा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्रदान करेगी और लोकतंत्र के मंदिर में भगवान जगन्नाथ की परंपरा को दर्शाएगी।
जगन्नाथ मंदिर के मुख्य प्रशासक अरविंद पाठी ने इस निर्णय पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए स्पीकर ओम बिरला का धन्यवाद किया।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर साझा करते हुए कहा कि यह कदम पूरे देश में जगन्नाथ संस्कृति और परंपरा को उजागर करेगा।
इससे पहले भी भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिए ओडिशा विधानसभा परिसर और राज्य अतिथि गृह में स्थापित किए गए थे। अब यह परंपरा संसद परिसर में भी स्थापित होने जा रही है, जो कि राष्ट्रीय राजधानी के केंद्र में भगवान जगन्नाथ की विरासत को प्रदर्शित करेगा।
मंदिर के पुजारियों और सेवकों ने इस निर्णय का जोरदार स्वागत किया है।
जगन्नाथ धाम के पुजारी सोमनाथ खुंटिया ने राष्ट्र प्रेस से कहा कि तीन दिन पहले लोकसभा स्पीकर ओम बिरला मंदिर में दर्शन के लिए आए थे। उन्होंने भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए और मंदिर प्रशासन की ओर से उन्हें एक उपहार दिया गया, जिसमें भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिए शामिल थे।
सोमनाथ खुंटिया ने कहा, "मैं मानता हूं कि संसद में भगवान जगन्नाथ का पूरा रथ होना चाहिए।" उन्होंने प्रशासन से अनुरोध किया कि जल्द से जल्द भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिए संसद में भेजे जाएं।
पुजारी ने कहा, "मुझे बहुत खुशी हो रही है कि भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिए या पूरा रथ, संसद में उनकी जगह बनना एक बड़ा सौभाग्य है। मैं आज भगवान जगन्नाथ के धाम से कह रहा हूं कि हमारी सरकार पूरी तरह से भगवान के प्रति आस्था रखती है, इसलिए उस आस्था को साकार करने के लिए हमें वहां इस पहिए को जल्द पहुंचाना चाहिए।"
उन्होंने यह भी कहा कि ओडिशा के लगभग साढ़े चार करोड़ लोग भी इस बात से बेहद खुश होंगे कि उनकी सांस्कृतिक विरासत संसद में प्रदर्शित होगी।