क्या आचार्य प्रशांत ने 77वें गणतंत्र दिवस पर कहा कि भीतरी स्वतंत्रता के बिना गणतंत्र अधूरा है?

Click to start listening
क्या आचार्य प्रशांत ने 77वें गणतंत्र दिवस पर कहा कि भीतरी स्वतंत्रता के बिना गणतंत्र अधूरा है?

सारांश

77वें गणतंत्र दिवस पर आचार्य प्रशांत ने बताया कि गणतंत्र का सार केवल संवैधानिक ढांचे में नहीं है, बल्कि इसकी शक्ति नागरिकों की भीतरी जागरूकता से आती है। उन्होंने भीतरी स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि जब आम आदमी जागरूक होगा, तभी लोकतंत्र सच्चे अर्थों में फल-फूल सकता है।

Key Takeaways

  • गणतंत्र का असली अर्थ केवल संवैधानिक ढांचे में नहीं है।
  • भीतरी स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र अधूरा है।
  • संविधान की प्रस्तावना आध्यात्मिक हृदय है।
  • आम आदमी को जागरूक होना चाहिए।
  • भारत को महान बनाने की जिम्मेदारी आम आदमी की है।

नई दिल्ली, 25 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर, विचारक और लेखक आचार्य प्रशांत ने यह कहा कि गणतंत्र का सही अर्थ केवल संवैधानिक ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी वास्तविक ताकत नागरिकों की भीतरी जागरूकता से उत्पन्न होती है।

उन्होंने कहा, "गणराज्य का अर्थ है कि आपके ऊपर कोई बाहरी शक्ति राज नहीं कर सकती। कोई राजा, रानी या परंपरागत व्यवस्था आपके ऊपर शासन नहीं करेगी। गण का मतलब है लोग, और लोग अपनी खुद की व्यवस्था बनाएंगे, इसलिए गणतंत्र के साथ लोकतंत्र चलता है।"

हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि आज की सबसे बड़ी चुनौती हमारे भीतर से आती है, न कि बाहर से। उन्होंने कहा, "जैसे जरूरी है कि बाहरी शक्तियां हम पर शासन न करें, वैसे ही यह महत्वपूर्ण है कि हमारी आदिम वृत्तियां, अनपरखी मान्यताएं और अहंकार भी हमें नियंत्रित न करें।" उन्होंने स्पष्ट किया कि जब हमारे भीतर का अज्ञान हमें शोषित करता है, तब यह किसी बाहरी आक्रमणकारी से भी अधिक खतरनाक हो सकता है।

आचार्य प्रशांत ने संविधान की प्रस्तावना के बारे में चर्चा करते हुए कहा, "मैं हमेशा कहता हूं कि प्रस्तावना में जो शब्द हैं, वे संविधान का आध्यात्मिक हृदय हैं। संविधान कहता है कि 'हम, भारत के लोग, संकल्पबद्ध होकर इस संविधान को आत्मार्पित करते हैं।' इसका अर्थ है कि हम किसी को अपने ऊपर हावी नहीं होने देंगे।"

भीतरी और बाहरी स्वतंत्रता के संबंध में उन्होंने गीता का उदाहरण दिया। "कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर जब अर्जुन के सामने बड़ा बाहरी युद्ध है, तो श्रीकृष्ण उसे बाहरी युद्ध लड़ने का तरीका नहीं सिखाते। बल्कि, वे अर्जुन को भीतरी ज्ञान देते हैं।" उन्होंने कहा, "जिसके पास भीतरी स्वतंत्रता होगी, उसे बाहरी तौर पर गुलाम नहीं बनाया जा सकता।"

संविधान के मूल आदर्शों पर उन्होंने कहा, "यह एक गहरी बात है कि सामान्य अहंकार संविधान के आदर्शों जैसे समाजवाद, पंथनिरपेक्षता, बंधुत्व, समानता और स्वतंत्रता को पसंद नहीं करता।" इससे स्पष्ट होता है कि संविधान का आधार आध्यात्मिक है। हम कहते हैं कि हम संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य हैं। ऊंचे शब्द हैं, लेकिन क्या इनमें से कुछ भी संभव हो सकता है बिना भीतरी प्रकाश के?

लोकतंत्र पर उन्होंने कहा, "यदि आम आदमी जागरूक नहीं है, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल जाता है।" समाजवाद पर उन्होंने कहा, "आम आदमी प्रसन्न तभी होता है जब उसे लगता है कि उसके पास पड़ोसी से अधिक धन है।" अहंकार अपने ही पंथ को सर्वश्रेष्ठ घोषित करना चाहता है, और ऐसी मानसिकता में पंथनिरपेक्षता केवल एक शब्द बनकर रह जाती है। उन्होंने आगे कहा, "न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व—कितने खूबसूरत शब्द हैं, लेकिन इन शब्दों में अर्थ केवल हमारी भीतरी रोशनी ही भर सकती है।"

उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा, "राष्ट्र केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं होता। राष्ट्र का मूल अर्थ होता है उसमें रहने वाले लोग। 'गण' का अर्थ है हम लोग, हम ही गण हैं। हमें खुद को ऊंचा उठाना होगा।" उन्होंने कहा, "महानता का दायित्व हम अतीत पर नहीं डाल सकते और न ही समाज के कुछ चुनिंदा लोगों पर। आम आदमी को महान बनना पड़ेगा।"

उन्होंने अध्यात्म की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा, "अध्यात्म एक गंभीर शब्द है। लोग इसे जटिल समझते हैं। लेकिन मेरा आशय सीधा है: स्वयं को देखना। अपनी कमजोरियों को आश्रय न देना। अपने दोषों और विकारों को समर्थन न देना।"

उन्होंने कहा कि जब आम भारतीय यह करने लगेगा, तो भारत राष्ट्र तेजी से महान बन जाएगा, और ऐसा महान कि पूरी दुनिया हमसे सीखना चाहेगी, और वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा सचमुच सार्थक हो जाएगी।

भारतीय राष्ट्रीयता पर उन्होंने कहा, "हमारा नेशनलिज्म न तो जिन्ना वाला है, न हिटलर वाला है, न बाल्कन वाला है। वैसी राष्ट्रीयता हिंसक होती है, पर हमारी राष्ट्रीयता दुश्मन नहीं मांगती। जिस प्रकार की राष्ट्रीयता हमारे संविधान में निहित है, वह संपूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी होती है।"

आचार्य प्रशांत ने अपने संदेश के अंत में कहा, "अंततः सारी बात आदर्शों पर नहीं, इंसान पर आती है। हमें एक सही इंसान चाहिए। हमारा संविधान भी यही मांग करता है कि हमें एक मजबूत और आत्मजागृत इंसान चाहिए।" उन्होंने कहा, "जब भारतीय श्रेष्ठ होगा, तो भारत को श्रेष्ठ बनाना बहुत आसान हो जाएगा।"

Point of View

वास्तव में हमारी सामाजिक संरचना के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। यह विचारशीलता न केवल हमारे संविधान को समझने में मदद करती है, बल्कि हमें एक जागरूक नागरिक बनने के लिए प्रेरित करती है।
NationPress
17/02/2026

Frequently Asked Questions

आचार्य प्रशांत ने गणतंत्र दिवस पर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि गणतंत्र का असली अर्थ केवल संवैधानिक ढांचे से नहीं, बल्कि नागरिकों की भीतरी जागरूकता से आता है।
भीतरी स्वतंत्रता का क्या महत्व है?
आचार्य प्रशांत के अनुसार, भीतरी स्वतंत्रता के बिना, लोकतंत्र केवल भीड़तंत्र बनकर रह जाएगा।
संविधान की प्रस्तावना का क्या महत्व है?
उन्होंने इसे संविधान का आध्यात्मिक हृदय बताया और कहा कि यह हमें अपने ऊपर किसी को हावी न होने देने का संदेश देती है।
Nation Press