क्या गुजराती में प्रकाशित आदि शंकराचार्य की ग्रंथावली युवाओं के लिए अनमोल खजाना है?
सारांश
Key Takeaways
- आदि शंकराचार्य की ग्रंथावली युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण खजाना है।
- गुजराती में ज्ञानसागर का विमोचन हुआ है।
- स्वामी अखंडानंद का योगदान अद्वितीय है।
- युवाओं के लिए साहित्य सस्ती दरों पर उपलब्ध है।
- ज्ञान का अंत नहीं होता, यह हमेशा आगे बढ़ता है।
अहमदाबाद, 15 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को अहमदाबाद में 'सस्तु साहित्य मुद्रणालय ट्रस्ट' द्वारा गुजराती भाषा में प्रकाशित आदि शंकराचार्य की ग्रंथावली का विमोचन किया। इस अवसर पर कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि आदिशंकराचार्य द्वारा रचित ज्ञानसागर का गुजराती में उपलब्ध होना गुजरात के पाठकों के लिए एक सुखद अनुभव है।
उन्होंने यह भी कहा कि गुजराती में प्रकाशित आदिशंकराचार्य की ग्रंथावली गुजरात के युवाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण खजाना है। संस्कृत में रचित आदिशंकराचार्य का यह ज्ञानसागर अब गुजराती युवाओं के लिए उपलब्ध है और भविष्य में जब उत्कृष्ट साहित्य पर चर्चा होगी, तब निश्चित रूप से 'सस्तु साहित्य मुद्रणालय ट्रस्ट' का यह प्रयास उसमें शामिल होगा।
अमित शाह ने कहा कि स्वामी अखंडानंद जी का जीवन इस प्रकार था कि लोगों ने उनके नाम में 'भिक्षु' जोड़ दिया। भिक्षु अखंडानंद ने आयुर्वेद, सनातन धर्म और समाज में उच्च विचारों को प्रस्तुत करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया। स्वामी अखंडानंद जी ने यह सपना देखा था कि गुजरात के युवाओं को उत्कृष्ट साहित्य सस्ती दरों पर उपलब्ध हो। उन्होंने एक बड़ी संस्था स्थापित की और अपने जीवनकाल में कई महत्वपूर्ण ग्रंथों को प्रकाशित किया, जिनमें श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत, रामायण, योग वशिष्ठ, स्वामी रामतीर्थ के उपदेश और नीति संबंधी ग्रंथ शामिल हैं।
गृह मंत्री ने कहा कि 'सस्तु साहित्य मुद्रणालय ट्रस्ट' ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र सहित कई महत्वपूर्ण ग्रंथों को गुजराती में उपलब्ध कराया है। गुजरात के सामूहिक चरित्र निर्माण में स्वामी अखंडानंद का योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने कई साहित्यिक सामग्री को एकत्रित करके बहुत सरलता से युवाओं तक पहुंचाने का कार्य किया। स्वामी अखंडानंद जी ने अनेक ऋषि-मुनियों के विचारों के माध्यम से सनातन धर्म के सार को गुजराती में प्रस्तुत किया। साथ ही, व्यक्ति के अस्तित्व को जागरूक करने के लिए उन्होंने कई बोधकथाएं भी गुजराती युवाओं को दीं।
उन्होंने यह भी कहा कि लोग यह सोचते थे कि इंटरनेट के आगमन के बाद कोई पुस्तकें नहीं पढ़ेगा, लेकिन इन 24 पुस्तकों का प्रकाशन इस विश्वास को मजबूत करता है कि नई पीढ़ी भी पढ़ने में रुचि रखती है। आदि शंकराचार्य जी का ज्ञानसागर अब हमारे गुजराती युवाओं के लिए उपलब्ध है और इसका उनके जीवन और कार्यों पर निश्चित रूप से गहरा प्रभाव पड़ेगा। आदि शंकराचार्य जी ने ऐसी परंपरा स्थापित की जिससे युगों-युगों तक सनातन की सेवा होती रहे।
उन्होंने कहा कि ज्ञान का कभी अंत नहीं होता, ज्ञान हमेशा आगे बढ़ता है। इस सृष्टि पर अब तक जितना ज्ञान उपलब्ध है, उसमें 'शिवोऽहम्' से बढ़कर कुछ नहीं है। इतनी सरल, सटीक और सत्य के निकट उपनिषदों की व्याख्या और कोई नहीं कर सकता, यह कार्य केवल आदि शंकराचार्य ही कर सकते थे। कई कुरीतियों के कारण सनातन धर्म को लेकर कई आशंकाएं उत्पन्न हो गई थीं। आदि शंकराचार्य जी के ग्रंथों को क्रमबद्ध रूप से पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में ही सभी आशंकाओं का निराकरण कर दिया और सभी किंतु-परंतु के तर्कबद्ध उत्तर उपलब्ध कराए।