क्या कृषि अपशिष्ट को देश का उपयोगी संसाधन बनाया जा सकता है?: नितिन गडकरी

Click to start listening
क्या कृषि अपशिष्ट को देश का उपयोगी संसाधन बनाया जा सकता है?: नितिन गडकरी

सारांश

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि कृषि अपशिष्ट को राष्ट्रीय संसाधन में बदलना संभव है। यह कदम न केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सशक्त बनाएगा। जानें कैसे बायो-बिटुमेन और नई तकनीकें इस दिशा में मदद कर सकती हैं।

Key Takeaways

  • कृषि अपशिष्ट को राष्ट्रीय संसाधन में बदलना संभव है।
  • बायो-बिटुमेन का निर्माण प्रदूषण में कमी लाएगा।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करेगा।
  • नई तकनीकें रोजगार सृजन में मदद करेंगी।
  • विदेशी मुद्रा की बचत होगी।

नई दिल्ली, 7 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि खेतों में उत्पन्न होने वाले कृषि अपशिष्ट को हमारे देश के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संसाधन के रूप में विकसित किया जा सकता है। यह उन्होंने बुधवार को वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के 'टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सेरेमनी' में कहा।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बताया कि बायो-बिटुमेन का निर्माण 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है।

कृषि से निकलने वाले कचरे का सही उपयोग करने से खेतों में पराली जलाने से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण में कमी आएगी और पुनः उपयोग वाली अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।

उन्होंने आगे कहा कि यदि सड़कों में 15 प्रतिशत बायो-बिटुमेन मिलाया जाए, तो भारत को लगभग 4,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है, जिससे देश की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता भी घटेगी।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आज भारत ने सड़क निर्माण में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। देश दुनिया का पहला ऐसा राष्ट्र बन गया है जिसने बायो-बिटुमेन का व्यावसायिक उत्पादन आरंभ किया है। उन्होंने इस उपलब्धि के लिए सीएसआईआर के वैज्ञानिकों को बधाई दी और सहयोग के लिए राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह का धन्यवाद किया।

गडकरी ने कहा कि यह नई तकनीक किसानों को सशक्त बनाने, गांवों में नई रोजगार संभावनाएं उत्पन्न करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायता करेगी।

उन्होंने बताया कि चावल की पराली से बने जैव बिटुमेन का सफल परीक्षण किया गया है, जो पेट्रोल से बने बिटुमेन से बेहतर साबित हुआ है। इससे पराली जलाने की समस्या में कमी आएगी।

अब समय आ गया है कि कृषि अपशिष्ट, फसल अवशेष, बांस और जैव पदार्थों को हरित ईंधन तथा उपयोगी उत्पादों में बदला जाए।

पिछले साल एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि भारत को हर साल 22 लाख करोड़ रुपये का जीवाश्म ईंधन आयात करना पड़ता है। पराली जलाने और वाहनों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण को बढ़ा रहा है, इसलिए भारत को ऊर्जा आयातक से ऊर्जा निर्यातक देश बनना चाहिए।

इंडियन बायोगैस एसोसिएशन (आईबीए) द्वारा हाल ही में जारी एक बयान के अनुसार, किसानों द्वारा हर साल 73 लाख टन धान की पराली जलाई जाती है। यदि इसे संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) और बायोएथेनॉल में बदला जाए, तो देश को 1,600 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और प्रदूषण में कमी आएगी।

बयान में आगे कहा गया है कि इस नीति से देश में लगभग 37,500 करोड़ रुपये का निवेश होने की संभावना है और 2028-29 तक 750 सीबीजी परियोजनाएं शुरू हो सकती हैं।

--आईएएनआई

डीबीपी/एबीएस

Point of View

बल्कि यह ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है। यह नीति देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
NationPress
09/01/2026

Frequently Asked Questions

कृषि अपशिष्ट का उपयोग कैसे किया जा सकता है?
कृषि अपशिष्ट को बायो-बिटुमेन, संपीड़ित बायोगैस, और बायोएथेनॉल में बदला जा सकता है।
बायो-बिटुमेन क्या है?
बायो-बिटुमेन एक जैविक उत्पाद है जो कृषि अपशिष्ट से बनाया जाता है और यह पारंपरिक बिटुमेन से बेहतर है।
इससे देश को क्या लाभ होगा?
इससे प्रदूषण में कमी आएगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
क्या यह तकनीक किसानों को लाभ पहुंचाएगी?
जी हां, यह तकनीक किसानों को सशक्त बनाएगी और उन्हें नए रोजगार के अवसर प्रदान करेगी।
क्या भारत बायो-बिटुमेन का व्यावसायिक उत्पादन कर रहा है?
जी हां, भारत दुनिया का पहला देश है जिसने बायो-बिटुमेन का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया है।
Nation Press