क्या अजमेर दरगाह पर पीएम की चादर चढ़ाने पर रोक की मांग सही है? सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की

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क्या अजमेर दरगाह पर पीएम की चादर चढ़ाने पर रोक की मांग सही है? सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने अजमेर दरगाह पर पीएम द्वारा चादर चढ़ाने की परंपरा को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। जानें इस मामले में क्या कहा गया और इससे जुड़े विवादों के बारे में।

Key Takeaways

  • सुप्रीम कोर्ट ने चादर चढ़ाने की परंपरा को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज किया।
  • यह परंपरा संविधान के अनुसार सही नहीं मानी गई।
  • अजमेर कोर्ट में एक अन्य मामला विचाराधीन है।

नई दिल्ली, 5 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। अजमेर में स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर *सालाना उर्स* के दौरान प्रधानमंत्री और अन्य संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा चादर चढ़ाने की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि इस निर्णय का अजमेर कोर्ट में चल रहे मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इस प्रकार के मामलों पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत निर्णय नहीं लिया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों का अजमेर की अदालत में दरगाह द्वारा शंकर मोचन महादेव मंदिर पर कथित "अवैध कब्जे" के संबंध में चल रहे मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

यह याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ के प्रमुख जितेंद्र सिंह बिसेन द्वारा दायर की गई थी। याचिका में कहा गया कि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1947 में पहली बार अजमेर शरीफ में चादर चढ़ाने की परंपरा शुरू की थी, और इसके बाद यह प्रथा हर साल निभाई जाती रही, लेकिन यह प्रथा किसी कानून में नहीं लिखी गई है और ना ही यह संविधान के अनुकूल है।

याचिका में यह भी दावा किया गया कि इस दरगाह के स्थान पर पहले एक प्राचीन शिव मंदिर था। इस विषय पर पहले से ही अजमेर कोर्ट में एक मामला विचाराधीन है। ऐसे में याचिकाकर्ता का तर्क था कि पेंडिंग केस के दौरान चादर चढ़ाने की परंपरा उस मामले को प्रभावित कर सकती है।

गौरतलब है कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के 814वें उर्स पर 22 दिसंबर को संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार की ओर से अजमेर दरगाह में चादर और फूल चढ़ाए। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री ने सम्मान के प्रतीक के रूप में पवित्र दरगाह पर चादर चढ़ाई। वहीं, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार की तरफ से अलग चादर चढ़ाई थी।

Point of View

हमें यह समझना चाहिए कि धार्मिक परंपराएं और कानूनी मुद्दे एक साथ चलते हैं। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस बात का संकेत है कि धार्मिक परंपराओं को संविधान के दायरे में रखना आवश्यक है। यह मुद्दा न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।
NationPress
06/01/2026

Frequently Asked Questions

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को क्यों खारिज किया?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के मामलों पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत निर्णय नहीं लिया जा सकता।
इस याचिका में क्या मुख्य बिंदु थे?
याचिका में कहा गया था कि चादर चढ़ाने की परंपरा न तो किसी कानून में लिखी गई है और न ही यह संविधान के अनुकूल है।
क्या यह परंपरा किसी प्रकार से विवादित है?
हां, याचिका में दावा किया गया था कि दरगाह के स्थान पर पहले एक प्राचीन शिव मंदिर था, जिससे यह परंपरा विवादित हो गई है।
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