गुजरात की लखपति दीदी: अस्मिताबेन का आत्मनिर्भरता का अनूठा सफर

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गुजरात की लखपति दीदी: अस्मिताबेन का आत्मनिर्भरता का अनूठा सफर

सारांश

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर, अस्मिताबेन अशोकभाई पटेल की कहानी एक प्रेरणा है। एक किसान परिवार से आकर, उन्होंने न केवल स्वयं का उद्योग स्थापित किया, बल्कि अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाया। यह कहानी दिखाती है कि कैसे महिलाएं एकजुट होकर समाज में परिवर्तन ला सकती हैं।

Key Takeaways

  • अस्मिताबेन ने 10 अन्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है।
  • उनकी वार्षिक आय 10.20 लाख रुपये है।
  • सह्याद्री सखी मंडल ने रोजगार सृजन का अनूठा मॉडल प्रस्तुत किया है।
  • उन्हें कई पुरस्कार मिले हैं, जिसमें 'कृषि रत्न पुरस्कार' शामिल है।
  • महिलाओं का एकजुट रहना उनके विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

गांधीनगर, 7 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। ‘नारी शक्ति ही समाज की असली शक्ति’ इस कहावत को पूरी तरह से प्रमाणित करती हैं गुजरात के चिखली तहसील के सोलधरा गांव की अस्मिताबेन अशोकभाई पटेल। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अस्मिताबेन के आत्मनिर्भरता की यात्रा के बारे में जानकर आपको आश्चर्य होगा कि एक किसान परिवार से संबंध रखने के बावजूद, उन्होंने न केवल अपना उद्योग स्थापित किया, बल्कि अन्य 10 महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाया है, जो हमारे माननीय प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत मिशन’ को साकार करता है।

विशेष रूप से, अप्रैल 2026 में सूरत में वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (वीजीआरसी) का आयोजन होने जा रहा है। इसमें स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमियों को वैश्विक बाजार से जोड़ने पर जोर दिया जाएगा। इस मंच के माध्यम से अस्मिताबेन जैसी महिला उद्यमियों को अपनी क्षमताएं प्रदर्शित करने का एक नया अवसर प्राप्त होगा।

गुजरात की चिखली तहसील के सोलधरा गांव में जन्मी अस्मिताबेन अशोकभाई पटेल का पालन-पोषण एक किसान परिवार में हुआ। खेती और पशुपालन का ज्ञान उन्हें बचपन से ही मिला। आर्ट टीचर डिप्लोमा (एटीडी) की पढ़ाई के दौरान उन्हें अपने पिता की मृत्यु का सामना करना पड़ा, लेकिन उनके प्रगतिशील सास-ससूर और खुद का आत्मविश्वास उनकी ढाल बन गए। विवाह के बाद उन्होंने बीए की डिग्री प्राप्त की, जिससे उनकी ज्ञान और आत्मविकास की यात्रा जारी रही।

खेती की आय सीमित थी, और घर चलाना भी कठिन था। इस कठिनाई के समय में, 2020-21 में अस्मिताबेन ने मधुमक्खी पालन का कोर्स किया और घर पर ही शहद का उत्पादन आरंभ किया। 2014 में नवसारी कृषि विश्वविद्यालय से बेकरी कोर्स किया। यह उत्साह और जुनून उनकी पहचान बन गया।

2015 में, अस्मिताबेन ने 10 महिलाओं के साथ मिलकर ग्राम विकास अधिकारियों के मार्गदर्शन में ‘सह्याद्री सखी मंडल’ की स्थापना की। उन्होंने आम, नींबू और करौंदा का अचार और मौसमी उत्पाद बनाने की गतिविधियों से शुरुआत की।

मिशन मंगलम के अंतर्गत 15,000 रुपये का रिवॉल्विंग फंड मिलने पर रागी (नागली) से बने उत्पाद, पापड़, बिस्कुट और आटे का उत्पादन शुरू हुआ। इन उत्पादों को स्थानीय, जिला और प्रादेशिक स्तर के कृषि मेलों में प्रदर्शित किया गया। इसके बाद, व्यावसायिक उद्देश्य के लिए 2,00,000 रुपये का ऋण लिया और हल्दी प्रोसेसिंग और पीसने की मशीन खरीदी, जिससे प्राकृतिक हल्दी पाउडर का उत्पादन आरंभ हुआ।

आज, सह्याद्री सखी मंडल की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर अस्मिताबेन ने प्राकृतिक और हाथ से बने खाद्य पदार्थों का उत्पादन शुरू कर दिया है। उनके स्वयं सहायता समूह की महिलाएं घर पर शहद पैकिंग और प्रोसेसिंग का कार्य करती हैं, जबकि अन्य महिलाएं अचार, आंवले की कैंडी, नागली की वेफर्स और बांस के हस्तशिल्प उत्पाद बनाती और बेचती हैं। इन उत्पादों को स्थानीय बाजार में बेचने के साथ-साथ राज्य और राष्ट्रीय स्तर के सरस मेलों में भी प्रदर्शित किया जाता है।

आज, अस्मिताबेन की वार्षिक आय 10.20 लाख रुपये है, अर्थात वे न केवल एक लखपति दीदी हैं, बल्कि अपने गांव और समुदाय में एक सम्मानित और मार्गदर्शक महिला भी हैं। वे अपनी इस सफलता का श्रेय मिशन मंगलम योजना और माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के गांवों की महिलाओं तक लाभ पहुंचाने के प्रयासों को देती हैं।

अस्मिताबेन को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत उनके कार्य प्रदर्शन के लिए कई पुरस्कार मिले हैं। उन्हें माननीय प्रधानमंत्री से तीन बार मिलने का अवसर प्राप्त हुआ है। उन्हें गुजरात सरकार की ओर से ‘कृषि रत्न पुरस्कार’ मिला है, साथ ही अप्रैल 2015 में जिला स्तर पर कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी – आत्मा अवॉर्ड भी प्राप्त हुआ है।

अस्मिताबेन पटेल का सफर केवल एक व्यक्तिगत सफलता नहीं है, यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और टिकाऊ विकास का एक आदर्श उदाहरण है। सह्याद्री सखी मंडल ने स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक कौशल और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके रोजगार सृजन की एक अनूठी मिसाल पेश की है।

अस्मिताबेन गर्व से कहती हैं, “जिस प्रकार एक मजबूत पेड़ की जड़ें एकता में होती हैं और उसकी शाखाएं अवसर मिलने पर फैल जाती हैं, उसी प्रकार हमारा यह समूह भी आज मजबूती से खड़ा है।” स्वरोजगार का उनका यह सफर साबित करता है कि जब महिलाएं एकजुट होती हैं, तब उनका विकास घर से समाज तक और वहां से देश के प्रत्येक कोने तक पहुंचता है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अस्मिताबेन जैसी ‘लखपति दीदीओं’ को सलाम, जो गांव की धरती से उठकर सह्याद्री जैसी अडिग शक्ति बन गई हैं और समाज में परिवर्तन का एक नया अध्याय लिख रही हैं।

Point of View

बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला सशक्तिकरण का एक आदर्श उदाहरण है।
NationPress
07/03/2026

Frequently Asked Questions

अस्मिताबेन ने कैसे आत्मनिर्भरता की शुरुआत की?
अस्मिताबेन ने मधुमक्खी पालन का कोर्स करके शहद का उत्पादन शुरू किया, और बाद में बेकरी कोर्स किया।
सह्याद्री सखी मंडल की स्थापना कब हुई?
सह्याद्री सखी मंडल की स्थापना 2015 में की गई थी।
अस्मिताबेन की वार्षिक आय कितनी है?
अस्मिताबेन की वार्षिक आय 10.20 लाख रुपये है।
उन्हें किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?
उन्हें 'कृषि रत्न पुरस्कार' और जिला स्तर पर 'आत्मा अवार्ड' मिला है।
अस्मिताबेन का सफर किस प्रकार का है?
अस्मिताबेन का सफर ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और टिकाऊ विकास का आदर्श उदाहरण है।
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