ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की वैश्विक शक्ति की कुंजी, मेजर जनरल केके सिन्हा ने आलोचकों को दिया करारा जवाब
सारांश
Key Takeaways
मेजर जनरल (रिटायर्ड) केके सिन्हा ने 30 अप्रैल को नई दिल्ली में ग्रेट निकोबार परियोजना की आलोचना करने वालों पर तीखा प्रहार किया और कहा कि इस तरह की आपत्तियाँ भारत के दीर्घकालिक सामरिक एवं आर्थिक हितों के विरुद्ध हैं। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनकी पार्टी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि कुछ लोग नहीं चाहते कि भारत वैश्विक स्तर पर एक मजबूत शक्ति के रूप में उभरे।
परियोजना का सामरिक महत्व
ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित इस परियोजना के तहत गलाथिया बे और इंदिरा प्वाइंट के आसपास एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट और एक आधुनिक शहर विकसित किए जाने की योजना है। सिन्हा के अनुसार, गलाथिया बे में प्राकृतिक रूप से 20 से 40 मीटर की गहराई वाला समुद्री तट उपलब्ध है, जिससे बड़े कंटेनर जहाजों के लिए न्यूनतम कृत्रिम निर्माण के साथ एक प्राकृतिक बंदरगाह विकसित किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि अंडमान-निकोबार के पास स्थित 9 डिग्री और 10 डिग्री चैनल जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों से वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। विशेषज्ञों के अनुसार, चीन के ऊर्जा आयात का एक बड़ा भाग भी इन्हीं मार्गों से होकर आता है। इसके अलावा मलक्का जलडमरूमध्य, सुंडा और लोम्बोक जैसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग भी इसी क्षेत्र के निकट हैं।
वैश्विक व्यापार पर संभावित प्रभाव
सिन्हा ने बताया कि यह स्थान करीब 90 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित है और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, यदि इस क्षेत्र का प्रभावी उपयोग किया जाए, तो वैश्विक समुद्री गतिविधियों — खासतौर पर ट्रांसशिपमेंट और ट्रांसपोर्टेशन कॉरिडोर — के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से को प्रभावित करने की क्षमता विकसित की जा सकती है।
उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य, मलक्का जलडमरूमध्य, स्वेज नहर और बाब-अल-मंदेब जैसे वैश्विक 'चोक पॉइंट्स' का उल्लेख करते हुए कहा कि अंडमान-निकोबार भी एक बड़ा लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित सामरिक चोक पॉइंट है। यदि ग्रेट निकोबार में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसपोर्टेशन पोर्ट विकसित होता है, तो कोलंबो और सिंगापुर जैसे हब्स की तुलना में दूरी और समय दोनों में कमी आएगी।
राजनीतिक विरोध और पर्यावरणीय चिंताएँ
सिन्हा ने कहा कि हाल के समय में इस परियोजना के विरोध के लिए पर्यावरण को प्रमुख आधार बनाया गया है और यह मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक भी पहुँच चुका है। उनका तर्क है कि भारत ने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है। गौरतलब है कि इस परियोजना को लेकर कई पर्यावरण विशेषज्ञ और संगठन भी अपनी चिंताएँ व्यक्त कर चुके हैं, जो इसे चर्चा के केंद्र में बनाए हुए हैं।
उन्होंने श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट में चीन की बढ़ती भागीदारी का उदाहरण देते हुए क्षेत्रीय रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की ओर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की मजबूत उपस्थिति उसे आने वाले दो-तीन दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन में शीर्ष स्थान तक पहुँचा सकती है।
भारत की भौगोलिक बढ़त और आर्थिक संभावनाएँ
सिन्हा के अनुसार, आने वाले 25–30 वर्षों में भारत अपनी भौगोलिक स्थिति, जनशक्ति, बौद्धिक संसाधनों और मजबूत होते सिस्टम के बल पर अन्य देशों को पीछे छोड़ सकता है। उन्होंने कहा कि यदि यह परियोजना पूरी तरह विकसित हो जाती है, तो यह दुनिया के सबसे बड़े बंदरगाहों में से एक बन सकती है, जिससे भारत की राजस्व क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
कुछ रणनीतिक हलकों में इसे 'थ्रेटनिंग डेवलपमेंट' के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि यह कई देशों के मौजूदा बंदरगाहों और व्यापारिक ढाँचों के लिए प्रतिस्पर्धी साबित हो सकती है। भविष्य में नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर और आर्कटिक जैसे नए व्यापारिक मार्गों के विकास के बावजूद, सिन्हा का मानना है कि हिंद महासागर क्षेत्र का सामरिक महत्व कम नहीं होगा।