ईडी ने ₹8.62 करोड़ के आईडीबीआई बैंक धोखाधड़ी मामले में गुवाहाटी की विशेष अदालत में अभियोजन शिकायत दर्ज की
सारांश
Key Takeaways
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के गुवाहाटी जोनल ऑफिस ने आईडीबीआई बैंक से जुड़े एक कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में, जिसमें ₹8.62 करोड़ का कथित नुकसान हुआ, कामरूप (मेट्रो) स्थित विशेष न्यायालय (धन शोधन निवारण अधिनियम) के समक्ष अभियोजन शिकायत दायर की है। अधिकारियों ने 30 अप्रैल 2026 को यह जानकारी दी। यह शिकायत ओटिस एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड और उसके डायरेक्टर सुरेश कुमार काशलीवाल के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत दर्ज की गई है।
मामले की पृष्ठभूमि
ईडी की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की गुवाहाटी स्थित भ्रष्टाचार निरोधक शाखा द्वारा भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एक एफआईआर के आधार पर शुरू हुई थी। केंद्रीय जांच ब्यूरो पहले ही सुरेश कुमार काशलीवाल, निर्मला देवी काशलीवाल और कंपनी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर चुका है।
मुख्य आरोप और धोखाधड़ी का तरीका
जांचकर्ताओं के अनुसार, ओटिस एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड ने अपने डायरेक्टर के माध्यम से दिसंबर 2009 में एक पूर्व-नियोजित साजिश के तहत आईडीबीआई बैंक की गुवाहाटी शाखा से कथित तौर पर धोखाधड़ी करके ₹3 करोड़ की कैश क्रेडिट सुविधा हासिल की थी। एजेंसी का आरोप है कि तीन ऐसी संपत्तियां, जिन्हें गिरवी रखने से पहले ही तीसरे पक्षों को बेचा जा चुका था, बैंक के पास गारंटी के रूप में पेश की गई थीं।
ईडी ने यह भी आरोप लगाया कि गारंटरों — रूमी जालान और नारायण डेका — के हस्ताक्षर गारंटी समझौतों, हलफनामों और गिरवी पत्रों सहित विभिन्न बैंक दस्तावेजों पर जाली बनाए गए थे। इसके अतिरिक्त, एक अन्य गारंटर मूली देवी सरावगी, जिनका निधन 23 जून 2009 को हो गया था, उनकी मृत्यु की जानकारी कथित तौर पर बैंक से छिपाई गई। ऋण प्राप्त करने के लिए वित्तीय वर्ष 2008-09 और 2009-10 की कथित मनगढ़ंत बैलेंस शीट भी जमा की गई थीं, जिनमें आय के आँकड़े बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाए गए थे।
मनी लॉन्ड्रिंग का आरोपित तरीका
एजेंसी के अनुसार, ऋण प्राप्त होते ही आरोपियों ने राशि को कंपनी के चालू खाते में स्थानांतरित कर दिया और लगभग 36 वेंडर भुगतानों के माध्यम से उस धन को घुमाया। इस प्रकार अवैध धन को नियमित व्यावसायिक लेनदेन के साथ मिलाकर उसे वैध संपत्ति के रूप में दर्शाया गया। इस ऋण खाते को 30 दिसंबर 2013 को 'नॉन-परफॉर्मिंग एसेट' (NPA) घोषित किया गया था।
बैंक और आरबीआई की भूमिका
आईडीबीआई बैंक ने 4 जून 2019 को इस ऋण को धोखाधड़ी के रूप में वर्गीकृत किया और 29 जुलाई 2019 को इसकी सूचना भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को दी। गौरतलब है कि आरोपी ने बाद में सितंबर-अक्टूबर 2024 में बैंक के साथ 'वन टाइम सेटलमेंट' (OTS) के ज़रिए ₹3.10 करोड़ की कुल बकाया मूल राशि का निपटारा कर लिया था।
कानूनी स्थिति और आगे की राह
ईडी ने स्पष्ट किया कि OTS के बावजूद, PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध एक जारी रहने वाला अपराध बना रहता है और इसे बैंक निपटान से समाप्त नहीं माना जा सकता। अब विशेष PMLA अदालत इस मामले में आगे की सुनवाई करेगी और अभियोजन की दिशा तय होगी।