IDBI बैंक धोखाधड़ी: ED ने ओटिस एसोसिएट्स और निदेशक काशलीवाल के खिलाफ PMLA कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की

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IDBI बैंक धोखाधड़ी: ED ने ओटिस एसोसिएट्स और निदेशक काशलीवाल के खिलाफ PMLA कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की

सारांश

ED के गुवाहाटी कार्यालय ने IDBI बैंक से ₹3 करोड़ की धोखाधड़ी में ओटिस एसोसिएट्स और निदेशक सुरेश कुमार काशलीवाल के खिलाफ PMLA कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की है। आरोपी ने 2024 में ₹3.10 करोड़ का OTS भुगतान किया, लेकिन ED का कहना है कि मनी लॉन्ड्रिंग एक सतत अपराध है और बैंक समझौते से आपराधिक दायित्व समाप्त नहीं होता।

Key Takeaways

ED गुवाहाटी ने ओटिस एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड और निदेशक सुरेश कुमार काशलीवाल के खिलाफ PMLA कोर्ट में अभियोजन शिकायत दाखिल की। आरोप है कि दिसंबर 2009 में IDBI बैंक, गुवाहाटी से ₹3 करोड़ का ऋण फर्जी संपत्ति गिरवी और जाली दस्तावेज़ों के आधार पर हासिल किया गया। बैंक को कुल ₹8.62 करोड़ का नुकसान हुआ; खाता 30 दिसंबर 2013 को NPA और जून 2019 में धोखाधड़ी घोषित। आरोपी ने 2024 में ₹3.10 करोड़ का OTS भुगतान किया, लेकिन ED ने PMLA के तहत कार्रवाई जारी रखी। मामला CBI, ACB गुवाहाटी की FIR पर आधारित; CBI ने भी आरोपपत्र दाखिल किया है।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) के गुवाहाटी क्षेत्रीय कार्यालय ने IDBI बैंक से जुड़े एक बड़े बैंक धोखाधड़ी मामले में ओटिस एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक सुरेश कुमार काशलीवाल के खिलाफ धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 (PMLA) के तहत विशेष न्यायालय, कामरूप (मेट्रो), गुवाहाटी में अभियोजन शिकायत (प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट) दाखिल की है। ED के अनुसार, आरोपियों पर मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध बनता है, जो PMLA की धारा 3 के तहत परिभाषित और धारा 4 व 70 के तहत दंडनीय है।

मामले की पृष्ठभूमि

ED ने यह जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), एसीबी गुवाहाटी द्वारा दर्ज प्राथमिकी (FIR) के आधार पर शुरू की थी। CBI ने इस मामले में सुरेश कुमार काशलीवाल, निर्मला देवी काशलीवाल और कंपनी के खिलाफ आरोपपत्र भी दाखिल किया है। गौरतलब है कि यह मामला एक दशक से अधिक पुराने बैंकिंग धोखाधड़ी नेटवर्क से जुड़ा है, जिसमें फर्जी दस्तावेज़ीकरण और संपत्ति की धोखाधड़ी शामिल है।

धोखाधड़ी का तरीका

जाँच में सामने आया कि कंपनी ने अपने निदेशक के माध्यम से दिसंबर 2009 में IDBI बैंक, गुवाहाटी से ₹3 करोड़ का ऋण धोखाधड़ी से हासिल किया। इस ऋण के लिए जिन संपत्तियों को गिरवी दिखाया गया, वे पहले ही तीसरे पक्ष को बेची जा चुकी थीं। इसके अलावा, गारंटरों के नाम पर फर्जी हस्ताक्षर कर बैंक दस्तावेज़ तैयार किए गए और एक मृत व्यक्ति की जानकारी भी बैंक से जानबूझकर छिपाई गई।

मनी लॉन्ड्रिंग का स्वरूप

ED के मुताबिक, आरोपियों ने ऋण की राशि को कंपनी के खातों में स्थानांतरित कर विभिन्न भुगतानों के ज़रिए उसे नियमित व्यावसायिक लेन-देन के साथ मिला दिया, ताकि अवैध धन को वैध दिखाया जा सके। यह खाता 30 दिसंबर 2013 को NPA (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) घोषित हुआ। जून 2019 में बैंक ने इसे धोखाधड़ी घोषित करते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को सूचित किया और CBI में शिकायत दर्ज कर लगभग ₹8.62 करोड़ के नुकसान की जानकारी दी।

OTS के बाद भी ED की कार्रवाई जारी

हालाँकि आरोपी ने 2024 में वन टाइम सेटलमेंट (OTS) के ज़रिए ₹3.10 करोड़ का भुगतान बैंक को कर दिया, लेकिन ED का स्पष्ट कहना है कि मनी लॉन्ड्रिंग एक सतत अपराध है और यह अपराध धन प्राप्त करने तथा उसके उपयोग के साथ ही प्रारंभ हो जाता है। इसलिए बैंक के साथ समझौते से PMLA के तहत आपराधिक दायित्व समाप्त नहीं होता। यह मामला अब विशेष न्यायालय में विचाराधीन है और आगे की सुनवाई का इंतजार है।

Point of View

और यह रुख देशभर में ऐसे सैकड़ों NPA मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है जहाँ आरोपियों ने आंशिक भुगतान से कानूनी राहत पाने की कोशिश की है। गौरतलब है कि ₹8.62 करोड़ के नुकसान में से केवल ₹3.10 करोड़ ही वसूले गए — यानी बैंक को अभी भी भारी घाटा है। यह मामला यह भी रेखांकित करता है कि 2009 की धोखाधड़ी का मुकदमा 2025 तक खिंचना भारतीय बैंकिंग धोखाधड़ी जाँच की धीमी गति को उजागर करता है।
NationPress
30/04/2026

Frequently Asked Questions

ED ने IDBI बैंक धोखाधड़ी मामले में क्या कार्रवाई की है?
ED के गुवाहाटी क्षेत्रीय कार्यालय ने ओटिस एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक सुरेश कुमार काशलीवाल के खिलाफ PMLA की धारा 3, 4 और 70 के तहत विशेष न्यायालय, कामरूप (मेट्रो), गुवाहाटी में अभियोजन शिकायत दाखिल की है।
ओटिस एसोसिएट्स पर क्या आरोप हैं?
आरोप है कि कंपनी ने दिसंबर 2009 में IDBI बैंक, गुवाहाटी से ₹3 करोड़ का ऋण फर्जी तरीके से लिया — पहले बेची जा चुकी संपत्तियाँ गिरवी दिखाईं, जाली हस्ताक्षर किए और मृत व्यक्ति की जानकारी छिपाई। ऋण राशि को बाद में नियमित व्यावसायिक लेन-देन में मिलाकर मनी लॉन्ड्रिंग की गई।
OTS भुगतान के बाद भी ED की कार्रवाई क्यों जारी है?
ED का कहना है कि मनी लॉन्ड्रिंग एक सतत अपराध है जो धन प्राप्त करने के साथ ही शुरू हो जाता है। इसलिए 2024 में किया गया ₹3.10 करोड़ का OTS भुगतान PMLA के तहत आपराधिक दायित्व को समाप्त नहीं करता।
इस मामले में बैंक को कितना नुकसान हुआ?
IDBI बैंक ने CBI में शिकायत दर्ज कर लगभग ₹8.62 करोड़ के नुकसान की जानकारी दी। आरोपी ने 2024 में OTS के तहत केवल ₹3.10 करोड़ का भुगतान किया, जिससे बैंक को अभी भी भारी घाटा है।
इस मामले में CBI की क्या भूमिका है?
ED ने यह जाँच CBI, ACB गुवाहाटी द्वारा दर्ज FIR के आधार पर शुरू की थी। CBI ने सुरेश कुमार काशलीवाल, निर्मला देवी काशलीवाल और कंपनी के खिलाफ अलग से आरोपपत्र भी दाखिल किया है।
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