IDBI बैंक धोखाधड़ी: ED ने ओटिस एसोसिएट्स और निदेशक काशलीवाल के खिलाफ PMLA कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की
सारांश
Key Takeaways
प्रवर्तन निदेशालय (ED) के गुवाहाटी क्षेत्रीय कार्यालय ने IDBI बैंक से जुड़े एक बड़े बैंक धोखाधड़ी मामले में ओटिस एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक सुरेश कुमार काशलीवाल के खिलाफ धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 (PMLA) के तहत विशेष न्यायालय, कामरूप (मेट्रो), गुवाहाटी में अभियोजन शिकायत (प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट) दाखिल की है। ED के अनुसार, आरोपियों पर मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध बनता है, जो PMLA की धारा 3 के तहत परिभाषित और धारा 4 व 70 के तहत दंडनीय है।
मामले की पृष्ठभूमि
ED ने यह जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), एसीबी गुवाहाटी द्वारा दर्ज प्राथमिकी (FIR) के आधार पर शुरू की थी। CBI ने इस मामले में सुरेश कुमार काशलीवाल, निर्मला देवी काशलीवाल और कंपनी के खिलाफ आरोपपत्र भी दाखिल किया है। गौरतलब है कि यह मामला एक दशक से अधिक पुराने बैंकिंग धोखाधड़ी नेटवर्क से जुड़ा है, जिसमें फर्जी दस्तावेज़ीकरण और संपत्ति की धोखाधड़ी शामिल है।
धोखाधड़ी का तरीका
जाँच में सामने आया कि कंपनी ने अपने निदेशक के माध्यम से दिसंबर 2009 में IDBI बैंक, गुवाहाटी से ₹3 करोड़ का ऋण धोखाधड़ी से हासिल किया। इस ऋण के लिए जिन संपत्तियों को गिरवी दिखाया गया, वे पहले ही तीसरे पक्ष को बेची जा चुकी थीं। इसके अलावा, गारंटरों के नाम पर फर्जी हस्ताक्षर कर बैंक दस्तावेज़ तैयार किए गए और एक मृत व्यक्ति की जानकारी भी बैंक से जानबूझकर छिपाई गई।
मनी लॉन्ड्रिंग का स्वरूप
ED के मुताबिक, आरोपियों ने ऋण की राशि को कंपनी के खातों में स्थानांतरित कर विभिन्न भुगतानों के ज़रिए उसे नियमित व्यावसायिक लेन-देन के साथ मिला दिया, ताकि अवैध धन को वैध दिखाया जा सके। यह खाता 30 दिसंबर 2013 को NPA (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) घोषित हुआ। जून 2019 में बैंक ने इसे धोखाधड़ी घोषित करते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को सूचित किया और CBI में शिकायत दर्ज कर लगभग ₹8.62 करोड़ के नुकसान की जानकारी दी।
OTS के बाद भी ED की कार्रवाई जारी
हालाँकि आरोपी ने 2024 में वन टाइम सेटलमेंट (OTS) के ज़रिए ₹3.10 करोड़ का भुगतान बैंक को कर दिया, लेकिन ED का स्पष्ट कहना है कि मनी लॉन्ड्रिंग एक सतत अपराध है और यह अपराध धन प्राप्त करने तथा उसके उपयोग के साथ ही प्रारंभ हो जाता है। इसलिए बैंक के साथ समझौते से PMLA के तहत आपराधिक दायित्व समाप्त नहीं होता। यह मामला अब विशेष न्यायालय में विचाराधीन है और आगे की सुनवाई का इंतजार है।