भारत में बैसाखी से पुथांडु तक: नववर्ष का उत्सव और विविधता

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भारत में बैसाखी से पुथांडु तक: नववर्ष का उत्सव और विविधता

सारांश

भारत में बैसाखी और पुथांडु जैसे नववर्ष के त्योहारों की विविधता और सांस्कृतिक महत्त्व को जानें। ये पर्व खेतों की रौनक लाते हैं और देश की समृद्ध परंपराओं का प्रतीक हैं।

Key Takeaways

  • बैसाखी और पुथांडु जैसे त्योहार देश की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं।
  • बैसाखी फसल के पकने का प्रतीक है और इसे विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है।
  • दक्षिण भारत में इसे विशु के नाम से मनाते हैं, जिसमें विशेष पूजा की जाती है।
  • बंगाल में इसे पोइला बैसाख के नाम से मनाया जाता है।
  • उत्तराखंड में बिखोती का विशेष महत्व है, जहाँ सांस्कृतिक मेले आयोजित होते हैं।

नई दिल्ली, १३ अप्रैल (राष्ट्र प्रेस): भारत एक विविधताओं से भरा देश है जहाँ हर राज्य में अलग-अलग रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। यही खूबसूरती और परंपराएं भारत को अन्य देशों से अलग बनाती हैं।

मंगलवार को देशभर में बैसाखी का त्योहार मनाया जाएगा, लेकिन विभिन्न नामों से। कुछ जगह इसे नववर्ष के रूप में मनाते हैं, जबकि अन्य इसे फसलों के पकने और कटाई के समय के रूप में मानते हैं। आज हम आपको भारत के विभिन्न हिस्सों में मनाई जाने वाली बैसाखी के बारे में बताएंगे।

उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में इसे बैसाखी और मेष संक्रांति कहा जाता है। इस दिन सूरज मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है, जिससे दिन पर प्रभाव पड़ता है और गर्मियां तेजी से बढ़ने लगती हैं। पंजाब और हरियाणा में इसे फसल पकने और गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा खालसा पंथ की स्थापना के दिन के रूप में मनाते हैं। उत्तराखंड में इसे 'बिखोती' और ओडिशा में 'महा विशुव संक्रांति' के नाम से जाना जाता है।

उत्तराखंड में 'बिखोती' का आयोजन १४-१५ अप्रैल को होगा, जिसमें लाटू देव की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन देवताओं को अनाज से बने प्रसाद चढ़ाए जाते हैं और मंदिरों के बाहर सांस्कृतिक मेलों का आयोजन किया जाता है।

असम में १४ अप्रैल को रंगाली बिहू मनाया जाता है, जिसे असमिया नववर्ष के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन असम में लोग रंगोली सजाते हैं और पारंपरिक मीठे पकवान खाते हैं। बंगाल में भी बैसाखी को नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। बंगाली कलेंडर के अनुसार, १४ अप्रैल से बंगाली नववर्ष की शुरुआत होती है, जिसे पोइला बैसाख कहा जाता है। इस दिन 'मंगल शोभाजात्रा' निकाली जाती है, जो यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत में शामिल है।

दक्षिण भारत में इसे विशु, यानी मलयाली नववर्ष, के रूप में मनाया जाता है। इस दिन केरल में भगवान को ताजे पीले फूल चढ़ाने की परंपरा है, और कुछ मंदिरों में भगवान की प्रतिमा को पीले फूलों और सोने से सजाया जाता है। तमिलनाडु में बैसाखी को पुथांडु के नाम से जाना जाता है, और इस दिन विशेष व्यंजन 'मंगा पचड़ी' बनती है। इसे बनाने के लिए मौसमी फलों का उपयोग किया जाता है, जैसे आम, इमली, गुड़ और नीम।

Point of View

बैसाखी और पुथांडु जैसे त्योहार हमारे समाज में एकता और समृद्धि का प्रतीक हैं। ये पर्व न केवल फसल के समय का जश्न मनाते हैं, बल्कि भारतीय परंपराओं को भी समृद्ध करते हैं।
NationPress
17/04/2026

Frequently Asked Questions

बैसाखी का त्योहार कब मनाया जाता है?
बैसाखी त्योहार हर साल 14 अप्रैल को मनाया जाता है।
पुथांडु का क्या महत्व है?
पुथांडु तमिल नववर्ष का प्रारंभ होता है और इसे विशेष व्यंजनों के साथ मनाया जाता है।
बिखोती क्या है?
बिखोती उत्तराखंड में मनाया जाने वाला एक त्योहार है जिसमें लाटू देव की पूजा की जाती है।
असम में नववर्ष कब मनाया जाता है?
असम में नववर्ष रंगाली बिहू के रूप में 14 अप्रैल को मनाया जाता है।
बैसाखी का अन्य नाम क्या है?
बैसाखी को मेष संक्रांति भी कहा जाता है।
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