क्या भारतीय नौसेना का पहला प्रशिक्षण स्क्वाड्रन सिंगापुर के चांगी नौसैनिक अड्डे पर पहुंचा?
सारांश
Key Takeaways
- भारतीय नौसेना का पहला प्रशिक्षण स्क्वाड्रन सिंगापुर पहुंचा।
- इसमें आईएनएस तिर, आईएनएस शार्दुल, आईएनएस सुजाता शामिल हैं।
- यात्रा का उद्देश्य समुद्री सहयोग को बढ़ाना है।
- प्रशिक्षण अभ्यास और सांस्कृतिक गतिविधियाँ आयोजित की जाएंगी।
- यह यात्रा भारत की 'एक्ट ईस्ट नीति' का हिस्सा है।
नई दिल्ली, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय नौसेना का पहला प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (1टीएस) 15 जनवरी को सिंगापुर के चांगी नौसैनिक अड्डे पर पहुंचा, जिसमें आईएनएस तिर, आईएनएस शार्दुल, आईएनएस सुजाता और भारतीय तटरक्षक जहाज सारथी शामिल हैं। यह स्क्वाड्रन दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर क्षेत्र में प्रशिक्षण अभियान पर है।
यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 2026 को ‘आसियान–भारत समुद्री सहयोग वर्ष 2026’ के रूप में मनाया जाएगा।
इस यात्रा के दौरान भारतीय नौसेना और सिंगापुर नौसेना (आरएसएन) के कर्मी कई बंदरगाह गतिविधियों और पेशेवर संवादों में भाग लेंगे, जिसका उद्देश्य क्षमताओं को बढ़ाना और समुद्री सहयोग को मजबूत करना है। दोनों नौसेनाओं के प्रशिक्षुओं के बीच सुनियोजित प्रशिक्षण अभ्यास, संयुक्त योग सत्र और खेल प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाएंगी।
सांस्कृतिक गतिविधियों के तहत भारतीय नौसेना बैंड सिंगापुर के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर प्रस्तुति देगा। इस दौरान जहाजों को स्कूली बच्चों के भ्रमण के लिए भी खोला जाएगा।
सिंगापुर पहुंचने पर भारत के उच्चायुक्त डॉ. शिल्पक अंबुले ने पहले प्रशिक्षण स्क्वाड्रन के प्रशिक्षुओं से बातचीत की। वरिष्ठ अधिकारी 1टीएस और कमांडिंग अधिकारियों ने समुद्री प्रशिक्षण और सिद्धांत कमान (एमटीडीसी) के कमांडर से भी मुलाकात की। सूचना संलयन केंद्र (इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर) के अंतरराष्ट्रीय संपर्क अधिकारियों की टीम के दौरे के दौरान पेशेवर अनुभव साझा किए गए।
यात्रा के दूसरे दिन सामुदायिक कार्यक्रम और सिंगापुर नौसेना के साथ संवाद हुए। सूचना संलयन केंद्र और आरएसएन संग्रहालय का दौरा, मैत्रीपूर्ण खेल मुकाबले, और श्री नारायण वृद्ध एवं नर्सिंग होम में जनसंपर्क गतिविधि इस दिन के प्रमुख आकर्षण रहे।
यह यात्रा दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ मजबूत समुद्री साझेदारी और निरंतर सहयोग को और सुदृढ़ करती है, जो भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ के अनुरूप है। इसके साथ ही यह दोनों नौसेनाओं के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग को बढ़ाती है और भारतीय महासागर नौसेना संगोष्ठी के प्रति भारत की नेतृत्वकारी भूमिका और प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
यह पहल ‘महासागर’ (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र उन्नति) की परिकल्पना के अनुरूप समुद्री सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।