क्या बिपिन चन्द्र ने इतिहास को जीवंत करने वाले कथाकार के रूप में अपनी पहचान बनाई?

Key Takeaways
- बिपिन चन्द्र ने भारतीय इतिहास लेखन को नई ऊँचाइयाँ दी।
- उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को एक जन-आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया।
- उनकी रचनाएँ मार्क्सवादी चिंतन से प्रभावित हैं।
- उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
- उनका लेखन सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
नई दिल्ली, 29 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा की पहाड़ियों में 1928 में जन्मे प्रोफेसर बिपिन चन्द्र ने भारतीय इतिहास लेखन में एक नई दिशा दी। एक प्रोफेसर और लेखक के रूप में, उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और आधुनिक भारत की गाथा को इस तरह प्रस्तुत किया कि वह हर पाठक के हृदय में गूंज उठी। उनके लेखन में मार्क्सवादी चिंतन और सामाजिक न्याय की गूंज थी, जिसने उन्हें भारतीय इतिहासकारों में अमर बना दिया।
उनका बचपन पंजाब की मिट्टी में गुजरा। लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज से स्नातक और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, कैलिफोर्निया से उच्च शिक्षा ने उनके बौद्धिक क्षितिज को विस्तारित किया।
1950 के दशक में, जब अमेरिका में मैकार्थीवाद अपने चरम पर था, बिपिन चन्द्र को अपने साम्यवादी विचारों के कारण देश छोड़ना पड़ा। दिल्ली लौटकर उन्होंने इतिहास लेखन को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। 1950 के दशक की शुरुआत में दिल्ली लौटने पर उन्हें दिल्ली के हिंदू कॉलेज में इतिहास का व्याख्याता नियुक्त किया गया। उन्होंने 1959 में दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी पूरी की।
उनकी कृति इंडियाज स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस आज भी यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए एक संदर्भ ग्रंथ है। इस पुस्तक में उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि एक विचारधारा, एक जन-आंदोलन और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की यात्रा के रूप में प्रस्तुत किया।
उनकी अन्य रचनाएं, जैसे हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न इंडिया और इंडिया सिन्स इंडिपेंडेंस, भारतीय इतिहास के सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक पहलुओं को गहराई से उजागर करती हैं।
बिपिन चन्द्र का लेखन केवल तथ्यों का संग्रह नहीं था। यह एक साहित्यिक यात्रा थी, जो पाठक को औपनिवेशिक भारत की गलियों, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और आर्थिक राष्ट्रवाद के उदय तक ले जाती थी। उनकी लेखनी में मार्क्सवादी चिंतन की छाप थी, जो सामाजिक न्याय और साम्यवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती थी। उनकी रचनाएं संतुलित थीं, जो सांप्रदायिकता और अंधविश्वास के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाती थीं।
जेएनयू में उनके व्याख्यान ऊर्जा और आत्मविश्वास से भरे होते थे। उनकी बुलंद आवाज और हिंदी-अंग्रेजी की मिली-जुली शैली विद्यार्थियों को मंत्रमुग्ध कर देती थी। भारत सरकार ने उनके साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए 2010 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।
30 अगस्त 2014 को लंबी बीमारी के बाद गुरुग्राम में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। बिपिन चन्द्र ने इतिहास को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा, उन्होंने इसे एक जीवंत कथा बनाया, जो हर भारतीय को अपनी जड़ों से जोड़ती है।