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क्या ब्रह्म मुहूर्त में उठना शरीर और मन के लिए फायदेमंद है?

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क्या ब्रह्म मुहूर्त में उठना शरीर और मन के लिए फायदेमंद है?

सारांश

क्या आप जानते हैं कि सुबह के समय उठने और सही दिनचर्या अपनाने से आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में कितना सुधार हो सकता है? जानें कैसे ब्रह्म मुहूर्त में उठना और आयुर्वेदिक आदतें आपको तनाव मुक्त और ऊर्जावान बना सकती हैं।

मुख्य बातें

ब्रह्म मुहूर्त में उठने से मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
गुनगुना पानी पीने से पाचन में मदद मिलती है।
दातून करने से मुंह की स्वच्छता बनी रहती है।
सुबह का हल्का भोजन शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।
योग और प्राणायाम से तनाव कम होता है।

नई दिल्ली, 28 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि रात को जल्दी सोने और सुबह जल्दी जागने का फायदा किसी स्वर्णिम अवसर से कम नहीं है। यदि आप रात को समय पर सोते हैं और सुबह समय पर उठते हैं, तो पूरा दिन ताजगी से भरा रहेगा। तनाव भरी जिंदगी में संतुलित जीवन जीना अनमोल है।

रोजाना ब्रह्ममुहूर्त (सुबह ४ से ६ बजे का समय) में उठना चाहिए। यह समय मन को शांति देने के साथ-साथ याददाश्त को भी बेहतर बनाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय जागने से ताजी हवा आपके शरीर में प्रवेश करती है। इससे मस्तिष्क को ताजगी मिलती है, जिससे तनाव कम होता है और पूरा दिन अच्छा गुजरता है।

आयुर्वेद विशेषज्ञ और हमारे बुजुर्ग सलाह देते हैं कि तांबे और मिट्टी के बर्तन में सुबह खाली पेट पानी पीने से कई व्याधियों से मुक्ति मिलती है। इस समय गुनगुना पानी पीना चाहिए। इससे कब्ज, गैस और पाचन संबंधी समस्याएं दूर रहती हैं। इसके अलावा, इससे खून साफ होता है और लिवर स्वस्थ रहता है।

एनआईएच के नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की 2012 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, तांबे में एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-वायरल और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो शरीर को भीतर से साफ करने में मदद करते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि कुछ घंटों तक तांबे के बर्तन में पानी रखा जाए, तो उसमें मौजूद कुछ हानिकारक बैक्टीरिया मर सकते हैं।

सुश्रुत संहिता के अनुसार, नीम या बबूल से दातून करने से मुंह में ताजगी बनी रहती है। साथ ही, जीभ, दांत और मुंह में जमा गंदगी साफ होती है और मसूड़े भी मजबूत होते हैं। ऐसे में सुबह नीम, बबूल या खैर का दातून करना चाहिए।

आयुर्वेद के अनुसार, सुबह ठंडे पानी से आंखें साफ करनी चाहिए। साथ ही, नाक में शुद्ध घी की दो बूंदें डालनी चाहिए।

आयुर्वेद में नाक को मस्तिष्क का प्रवेश द्वार माना जाता है, और इसमें घी डालने से मस्तिष्क को पोषण मिलता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है। हालांकि, एलर्जी या नाक बंद होने की स्थिति में इसका प्रयोग करने से बचना चाहिए।

सूर्योदय से पहले हल्का व्यायाम, योग और प्राणायाम करने से रक्त संचार में सुधार होता है, साथ ही रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और मानसिक तनाव कम होता है। रोजाना सूर्य नमस्कार और अनुलोम-विलोम जैसे अभ्यास करना चाहिए।

आयुर्वेद में स्नान को आयु, बल और सौंदर्य बढ़ाने वाला माना गया है। गुनगुने पानी से स्नान करने से थकान और आलस्य दूर होते हैं, जिससे मन तरो-ताजा और प्रसन्न रहता है।

इसके बाद ध्यान और प्रार्थना जरूर करें। यह मन को शांत रखने के साथ-साथ नकारात्मक विचारों को दूर करने में मदद करता है। साथ ही, दिनभर के लिए सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

सुबह का भोजन हल्का या मौसमी होना चाहिए, जिसमें मूंग दाल की खिचड़ी, दलिया, फल या दूध-घी से बनी चीजें शामिल होनी चाहिए। यह पाचन को संतुलित करने के साथ मोटापे से भी बचाता है और शरीर को दिनभर ऊर्जावान बनाए रखता है।

आयुर्वेदिक दिनचर्या को अपनाकर आप न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बना सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

हमें यह समझना चाहिए कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाना केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए भी आवश्यक है। आज की तेज़ी से भागती दुनिया में, हमें संतुलित और स्वस्थ दिनचर्या को अपनाने की आवश्यकता है, जो न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज की भलाई के लिए भी अनिवार्य है।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रह्म मुहूर्त में उठने के क्या लाभ होते हैं?
ब्रह्म मुहूर्त में उठने से मानसिक शांति, ताजगी और ऊर्जा मिलती है। यह समय ध्यान और योग के लिए भी उपयुक्त होता है।
सुबह के समय कौन सा पानी पीना चाहिए?
सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीने से पाचन संबंधी समस्याएं दूर होती हैं।
क्या दातून करना आवश्यक है?
हां, दातून करने से मुंह की ताजगी और स्वच्छता बनी रहती है।
स्नान का क्या महत्व है?
गुनगुने पानी से स्नान करने से थकान और आलस्य दूर होते हैं, जिससे मन प्रसन्न रहता है।
सुबह का भोजन कैसा होना चाहिए?
सुबह का भोजन हल्का और मौसमी होना चाहिए, जैसे मूंग दाल की खिचड़ी या दलिया।
राष्ट्र प्रेस
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