दिल्ली हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय, किराया माफी संबंधी आदेश रद्द
सारांश
Key Takeaways
- दिल्ली हाईकोर्ट ने किराया माफी संबंधी आदेश रद्द किया।
- अरविंद केजरीवाल का बयान कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
- सरकारी बयान और आश्वासन की कानूनी वैधता पर सवाल उठता है।
- गरीब किरायेदारों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
- आगे क्या कदम उठाए जाएंगे, यह देखना होगा।
नई दिल्ली, 6 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में वर्ष 2020 के लॉकडाउन के दौरान गरीब किरायेदारों के संदर्भ में दिए गए बयान के मामले में निचली पीठ के आदेश को रद्द कर दिया है। यह मामला अरविंद केजरीवाल के बयान से संबंधित था, जिसे पहले अदालत द्वारा लागू करने के योग्य माना गया था।
वास्तव में, 29 मार्च 2020 को देशव्यापी बंदी लागू होने के कुछ समय बाद, तत्कालीन मुख्यमंत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मकान मालिकों से अनुरोध किया था कि वे गरीब किरायेदारों से किराया न लें या उसे कुछ समय के लिए स्थगित करें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि कोई गरीब किरायेदार किराया देने में असमर्थ है, तो सरकार उनकी सहायता करने पर विचार करेगी।
इसके बाद, वर्ष 2021 में दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इसे एक प्रकार का आश्वासन मानते हुए कहा कि इसे लागू किया जा सकता है। इस आदेश के खिलाफ दिल्ली सरकार ने अपील की, जिस पर अब डिवीजन बेंच ने सुनवाई की।
डिवीजन बेंच ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि किसी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयानों को लागू कराने के लिए अदालत द्वारा आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रकार के बयानों को कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं माना जा सकता और इसे लागू करने के लिए निर्देश देना न्यायिक अधिकार के क्षेत्र में नहीं आता।
सुनवाई के दौरान, तत्कालीन मुख्यमंत्री ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि उनका बयान किसी औपचारिक वचन के रूप में नहीं था, बल्कि एक अपील थी, जिसका उद्देश्य संकट के समय लोगों में सहयोग की भावना को बढ़ावा देना था।
अदालत ने इन तर्कों को मानते हुए कहा कि इस तरह के सार्वजनिक बयानों को कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।