क्या दिल्ली शब्दोत्सव 2026 में आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने हिंदुओं को अपनी अस्मिता के लिए और तैयार होने की सलाह दी?
सारांश
Key Takeaways
- हिंदुओं को अपनी अस्मिता के लिए सजग रहना चाहिए।
- 'शब्दोत्सव 2026' एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उत्सव है।
- हमारे इतिहास को सही रूप में समझना आवश्यक है।
- विचारों का आदान-प्रदान समाज में आवश्यक है।
- युवाओं को इतिहास की जानकारी देने की आवश्यकता है।
नई दिल्ली, 3 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। हनुमत निवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित भारतीय साहित्यिक और सांस्कृतिक उत्सव 'शब्दोत्सव 2026' कार्यक्रम की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि हिंदुओं को अपनी अस्मिता के लिए और अधिक तैयार होना चाहिए।
समाचार एजेंसी राष्ट्र प्रेस से बातचीत में आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने 'शब्दोत्सव' के बारे में कहा, "शब्दों के माध्यम से ही परंपरा पीढ़ियों में यात्रा करते हुए हमारे पास तक आई है। कार्यक्रम में उस पर चर्चा हो रही है। 'हिंदू इतिहास' पर कार्यक्रम में चर्चा की गई। हिंदू इतिहास से मतलब है कि भारत की परंपरा का इतिहास और अतीत का बोझ, सनातन मूल्य यात्रा करते हुए हम तक आए हैं, इस पर चर्चा की जाए।"
उन्होंने कहा, "दुनियाभर में अनेक प्रसंग हैं और सभी का एक ही निष्कर्ष है कि हिंदू अपनी अस्मिता के लिए और अधिक तैयार हों। यह दुनिया लगातार अस्तित्व के संघर्ष की ओर बढ़ी है, जो अपने अस्तित्व को लेकर रणनीति से युक्त नहीं हैं, उनके सामने चुनौतियां हैं। भविष्य में क्या घटनाएं हो सकती हैं, इस बात के लिए हिंदुओं को तैयार किया जाना चाहिए।"
वहीं, लेखिका अमी गणत्रा ने भी कार्यक्रम की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यह अच्छा कार्यक्रम रहा है और यहां बहुत अच्छे वक्ता आए हैं, जिन्होंने अपने विचार रखे हैं।
'हिंदू इतिहास' पर बोलते हुए उन्होंने कहा, "कई बार हम अपने इतिहास को झूठ मानने लगते हैं। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें अपने इतिहास को सही से समझना होगा। यह भी ध्यान देना होगा कि कोई भी मनगढ़ंत कहानी इतिहास नहीं होती है। इसलिए इतिहास को लेकर शोध होना चाहिए। इतिहास को इतिहास के रूप में समझना होगा। इसे राइट विंग और लेफ्ट विंग के हिसाब से नहीं देखा जाना चाहिए। इसे सत्य की खोज के रूप में देखा जाना चाहिए। आज की युवा पीढ़ी तक इतिहास पहुंचे, उसके लिए उसकी भाषा में विज्ञान का साथ लेकर पेश करना होगा। इस दिशा में भी चर्चाएं होती रहनी चाहिए।"
लेखिका ने कहा कि अभी तक समाज और देश में एक ही तरह के विचार थे। जो बात ऊपर से कही जाती थी, उसी को नीचे तक पहुंचाना था, चाहे उसका सबूत हो या नहीं हो। आज के दौर में विचारों को दबाकर नहीं रखा जा सकता है। सभी लोग अपने-अपने तरीके से अपनी बातें रख रहे हैं।