दिल्ली शब्दोत्सव 2026: क्या हम अपनी पहचान बिना समझे अपनी प्राथमिकता और दिशा तय कर सकते हैं?
सारांश
Key Takeaways
- भारतीय पहचान को समझना आवश्यक है।
- पहचान के बिना नीतियाँ स्पष्ट नहीं हो सकतीं।
- सिर्फ एक नाम से ही राष्ट्र की पहचान होती है।
- वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को पहचानना जरूरी है।
- संस्कृति और आध्यात्मिकता में भारत का योगदान महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली, 4 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली शब्दोत्सव 2026 कार्यक्रम में रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य मौजूद रहे। इस अवसर पर उन्होंने भारतीय पहचान पर चर्चा करते हुए कहा कि हर भारतीय को पहले यह समझना चाहिए कि हम क्या हैं।
डॉ. मनमोहन वैद्य ने अमेरिकी लेखक सैमुअल हंटिंगटन की पुस्तक 'हू आर वी' का उल्लेख करते हुए कहा, "पुस्तक में यह बताया गया है कि एक राष्ट्र के रूप में हम कौन हैं? जब तक हम इसे निर्धारित नहीं करते, तब तक हमारी प्राथमिकता और दिशा स्पष्ट नहीं हो सकती।"
उन्होंने आगे कहा, "रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी पुस्तक स्वदेशी समाज में कहा है कि सबसे पहले हमें वह बनना होगा जो हम हैं। हमें यह जानना आवश्यक है कि हम क्या हैं। दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जिसके दो नाम हों। हर देश का एक ही नाम है, लेकिन हमारे यहाँ यह प्रश्न अभी भी बना हुआ है कि हम इंडिया हैं या भारत?"
वैद्य ने उदाहरण देते हुए कहा, "बगल में स्थित ब्रह्मदेश देश था, जिसे बाद में वर्मा और फिर म्यांमार कहा गया, परंतु अब उसे केवल म्यांमार ही कहा जाता है। जब तक हम अपनी पहचान तय नहीं करते, तब तक हमारी विदेश नीति, रक्षा नीति, शिक्षा नीति और आर्थिक नीति स्पष्ट नहीं हो सकती।"
उन्होंने कहा, "आजादी के बाद भी हम पश्चिमी संस्कृति की नकल करते रहे हैं। 2014 के चुनाव परिणाम के बाद इंग्लैंड के 'द गार्डियन' ने लिखा था कि 18 मई 2014 भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन होगा। ऐसे में यदि हमें भारत की दिशा निर्धारित करनी है और विश्व में अपनी भूमिका निभानी है, तो पहले हमें यह समझना होगा कि हम क्या हैं।"
डॉ. मनमोहन वैद्य ने एक प्रसिद्ध चीनी राजनयिक हू शिह का उद्धरण साझा करते हुए कहा, "बिना एक भी सिपाही भेजे, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भारत का चीन पर 2000 वर्षों तक प्रभुत्व रहा।" इसलिए भारत को समझना हमारे लिए अत्यंत आवश्यक है।