दिल्ली: सोनिया गांधी के मतदाता सूची विवाद पर अदालत की सुनवाई, लिखित दलीलें जमा करने का निर्देश
सारांश
Key Takeaways
- सोनिया गांधी के खिलाफ मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का मामला चल रहा है।
- अदालत ने लिखित दलीलें जमा करने का आदेश दिया है।
- शिकायतकर्ता ने जांच की मांग की है।
- अगली सुनवाई 16 मई को होगी।
- यह मामला नागरिकता और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा है।
नई दिल्ली, 18 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। राऊज एवेन्यू अदालत में शनिवार को सोनिया गांधी के खिलाफ भारतीय नागरिकता प्राप्त किए बिना मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के मामले में संशोधन याचिका की सुनवाई हुई। शिकायतकर्ता ने अपनी सभी दलीलें प्रस्तुत कर दी हैं। अदालत ने दोनों पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपनी लिखित दलीलें जमा करने का आदेश दिया है।
सोनिया गांधी की तरफ से पेश वकील ने अगली सुनवाई में कुछ अतिरिक्त दलीलें रखने की अनुमति मांगी। अदालत ने इस पर विचार करते हुए 16 मई को अगली सुनवाई तय की है। शिकायतकर्ता के वकील विकास त्रिपाठी ने चुनाव आयोग से प्राप्त दस्तावेजों को अदालत के रिकॉर्ड में शामिल करने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने तुरंत स्वीकार कर लिया।
शिकायतकर्ता पक्ष ने स्पष्ट किया कि वे मुकदमे की सुनवाई की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि केवल पुलिस से जांच कराने की अपील कर रहे हैं। उनका कहना था कि सोनिया गांधी के वकील उनके सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए। यह मुद्दा महत्वपूर्ण है क्योंकि 1980 की मतदाता सूची में उनका नाम तब जुड़ा था जब सोनिया गांधी को भारतीय नागरिकता नहीं मिली थी। इसमें धोखाधड़ी या गलत तरीके से दस्तावेजों का उपयोग किया जा सकता है। गलत जानकारी देना कानून के अनुसार एक अपराध है, इसलिए यह मामला जांच का विषय है और अदालत को पुलिस को जांच का आदेश देना चाहिए।
पिछली सुनवाई में सोनिया गांधी की ओर से दाखिल जवाब में इस याचिका को तथ्यहीन, राजनीतिक रूप से प्रेरित और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया गया था। वकील विकास त्रिपाठी ने इस संशोधन याचिका को दाखिल किया है। इससे पहले मजिस्ट्रेट अदालत ने सितंबर महीने में इस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने और पुलिस जांच कराने की मांग की गई थी।
याचिका में आरोप है कि सोनिया गांधी ने 30 अप्रैल 1983 को नागरिकता प्राप्त की थी, लेकिन उनका नाम 1980 की नई दिल्ली मतदाता सूची में पहले से ही शामिल था। याचिका में सवाल उठाए गए हैं कि 1980 में नाम कैसे जोड़ा गया और 1982 में इसे अचानक हटा क्यों दिया गया? जब 1983 में नागरिकता प्राप्त हुई, तब किस आधार पर 1980 में नाम शामिल किया गया था? क्या इसके लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया था?