धर्मेंद्र प्रधान ने स्टालिन सरकार की 'वोट बैंक' राजनीति पर उठाए सवाल
सारांश
Key Takeaways
- धर्मेंद्र प्रधान ने 'थ्री लैंग्वेज पॉलिसी' का समर्थन किया।
- स्टालिन ने इसे 'हिंदी थोपने की कोशिश' बताया।
- केंद्र सरकार ने शिक्षा में सुधार के लिए तैयारी की है।
- राज्य सरकार की राजनीति के कारण योजनाएँ प्रभावित हो रही हैं।
- भाषाई स्वतंत्रता का महत्व बढ़ता जा रहा है।
नई दिल्ली, 4 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बीच 'थ्री लैंग्वेज पॉलिसी' को लेकर विवाद बढ़ गया है। जहाँ स्टालिन ने इसे 'हिंदी थोपने की कोशिश' करार दिया, वहीं धर्मेंद्र प्रधान ने इस आरोप को पूरी तरह से खारिज करते हुए इसे 'वोट बैंक की राजनीति' बताया है।
धर्मेंद्र प्रधान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भाषाई स्वतंत्रता का दस्तावेज है। यह नीति मातृभाषा को प्राथमिकता देती है, ताकि हर बच्चा अपनी भाषा में प्रगति कर सके।
उन्होंने यह भी कहा कि इस लचीली नीति को 'अनिवार्य हिंदी' के रूप में पेश कर तमिलनाडु सरकार छात्रों के लिए नए अवसरों में बाधा डाल रही है।
केंद्रीय मंत्री प्रधान ने बताया कि बहुभाषावाद किसी भाषा के लिए खतरा नहीं है, बल्कि यह उसे और मजबूत बनाता है। तमिल भाषा कमजोर नहीं होती, बल्कि तब और समृद्ध होती है जब उसके बोलने वाले कई भाषाएँ जानते हैं। धर्मेंद्र प्रधान ने यह भी बताया कि 'नेप' सभी भाषाओं को समान रूप से बढ़ावा देती है और पुरानी दो-भाषा प्रणाली की सीमाओं को दूर करने का प्रयास करती है।
उन्होंने कहा कि इस नीति को लागू करने के लिए 'समग्र शिक्षा', शिक्षक प्रशिक्षण और जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डीआईईटी) जैसे संस्थानों को मजबूत किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, एनपीएसटी और एनएमएम जैसे राष्ट्रीय ढांचे के माध्यम से शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाया जा रहा है।
सीएम स्टालिन द्वारा उठाए गए 'परस्परता' के सवाल पर भी धर्मेंद्र प्रधान ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तमिल भाषा को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सम्मान प्राप्त हुआ है। उन्होंने यह आरोप लगाया कि तमिलनाडु सरकार 'वोट बैंक की राजनीति' के चलते छात्रों को बहुभाषी बनने के अवसर से वंचित कर रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने पीएम श्री स्कूल योजना के तहत एमओयू साइन नहीं किया, जिससे इन स्कूलों की स्थापना रुक गई है। उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद तमिलनाडु में जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना भी रोकी जा रही है, जो गरीब छात्रों के हितों के खिलाफ है।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार पूरी तरह से फंडिंग और शिक्षक प्रशिक्षण के लिए तैयार है, लेकिन राज्य सरकार की राजनीति के कारण योजनाओं की प्रगति रुक रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि एक प्रगतिशील और समावेशी शिक्षा सुधार को 'भाषाई थोपने' के रूप में पेश करना लोगों में भ्रम फैलाने का प्रयास है। उन्होंने मुख्यमंत्री स्टालिन से अपील की कि वे 'हिंदी थोपने' के मुद्दे को छोड़कर देश की सभी भाषाओं को सशक्त बनाने के राष्ट्रीय मिशन में सहयोग करें।