क्या तमिलनाडु चुनाव से पहले डीएमके खेमे में गठबंधन को लेकर अनिश्चितता है?
सारांश
Key Takeaways
- डीएमके ने अभी तक चुनावी गठबंधन को अंतिम रूप नहीं दिया है।
- चुनाव का मुकाबला चार-कोणीय होगा।
- डीएमडीके की मांग से स्थिति जटिल हुई है।
- राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डीएमके जानबूझकर देरी कर रही है।
- चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, जिससे अटकलें बढ़ रही हैं।
चेन्नई, 24 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में अब केवल दो महीने का समय शेष है, लेकिन सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने अभी तक अपने चुनावी गठबंधन को अंतिम रूप नहीं दिया है। पार्टी की इस रणनीतिक चुप्पी ने राज्य की राजनीति में अटकलों का माहौल बना दिया है।
चुनाव आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा (जो अगले महीने के अंत तक संभावित है) के तुरंत बाद नामांकन प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इस दौरान सभी दलों पर गठबंधन तय करने, सीटों का बंटवारा करने और उम्मीदवारों के नाम घोषित करने का दबाव बढ़ता जा रहा है।
इस बार का चुनाव एक चार-कोणीय मुकाबला माना जा रहा है। एक तरफ डीएमके के नेतृत्व वाला गठबंधन है, जबकि विपक्ष में एआईएडीएमके अपना मोर्चा संभाले हुए है। अभिनेता से नेता बने कमल हासन की मक्कल निधि मय्यम (एमएनएम) इस बार डीएमके के साथ आ गई है, जिससे सत्तारूढ़ गठबंधन को मजबूती मिली है।
वहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एआईएडीएमके के साथ अपना गठबंधन बनाए रखा है। इस मोर्चे में पीएमके, तमिल मानिला कांग्रेस, न्यू जस्टिस पार्टी, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया और पेरुनथलाइवर मक्कल काची जैसी पार्टियां भी शामिल हैं।
इसके अलावा, सीमैन की तमिलर काची (एनटीके) ने अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है, जिससे मुकाबला और जटिल हो गया है।
हालांकि 2006 के बाद से डीएमके तीन बार विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है और अब लगातार चौथे चुनाव की तैयारी में है, लेकिन उसने अब तक अंतिम गठबंधन फॉर्मूला घोषित नहीं किया है। इस देरी की बड़ी वजह डीएमडीके (देशीय मुरपोक्कु द्रविड़ कड़गम) के साथ चल रही बातचीत मानी जा रही है।
राजनीतिक हलकों के अनुसार, डीएमडीके ने प्रारंभ में डीएमके और एआईएडीएमके दोनों से 30 विधानसभा सीटों और एक राज्यसभा सीट के साथ-साथ चुनाव खर्च के लिए भारी वित्तीय सहयोग की मांग की थी। यह मांग दोनों प्रमुख द्रविड़ दलों के लिए चौंकाने वाली बताई जा रही है।
इसके बाद डीएमके और एआईएडीएमके दोनों ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि डीएमडीके का वोट शेयर, जो कभी करीब 10.5 प्रतिशत था, अब घटकर एक प्रतिशत से भी नीचे आ चुका है और पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी अलग हो चुके हैं। दोनों खेमों के नेताओं ने साफ किया कि ऐसी स्थिति में बड़ी संख्या में सीटें देना संभव नहीं है।
इसके बाद डीएमडीके महासचिव प्रेमलता विजयकांत ने अपने रुख में नरमी के संकेत दिए। पहले उन्होंने दो अंकों की सीटों की बात कही, लेकिन बाद में चर्चा छह से आठ सीटों तक सिमटती नजर आई, जबकि राज्यसभा सीट पर बातचीत को बाद के लिए छोड़ दिया गया।
कुड्डालोर में पार्टी बैठक को संबोधित करते हुए प्रेमलता विजयकांत ने कहा कि गठबंधन को लेकर फैसला हो चुका है, लेकिन जब बड़ी पार्टियां ही अपने अंतिम गठबंधन की घोषणा नहीं कर रही हैं, तो जल्दबाजी में ऐलान की क्या आवश्यकता है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डीएमके जानबूझकर घोषणा में देरी कर रही है और संभव है कि वह कांग्रेस नेतृत्व वाले समीकरण में किसी संभावित टूट का इंतजार कर रही हो, जिससे उसकी मोलभाव की स्थिति मजबूत हो सके।
जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, डीएमके खेमे में बनी यह अनिश्चितता तमिलनाडु की राजनीति की सबसे ज्यादा चर्चित और नजर रखी जाने वाली घटनाओं में से एक बनती जा रही है।