क्या चिल्का झील में डॉल्फिन गणना का सर्वे शुरू हो गया है?

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क्या चिल्का झील में डॉल्फिन गणना का सर्वे शुरू हो गया है?

सारांश

चिल्का झील में डॉल्फिन गणना की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह सर्वेक्षण पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जानें क्यों यह गणना हमारे लिए अत्यावश्यक है और कैसे यह स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती है।

Key Takeaways

  • चिल्का झील एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है।
  • इरावदी डॉल्फिन का प्राकृतिक आवास है।
  • डॉल्फिन गणना से पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति का पता चलता है।
  • पर्यटकों को प्लास्टिक का उपयोग न करने की अपील की गई है।
  • स्थानीय समुदायों की आजीविका डॉल्फिन की सुरक्षा पर निर्भर करती है।

पुरी, 21 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। चिल्का झील में डॉल्फिन जनगणना का कार्यक्रम आरंभ हो चुका है। यह गणना ओडिशा के सतपड़ा क्षेत्र से शुरू की गई है। चिल्का झील एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है और सर्दियों के मौसम में प्रवासी पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है। अपनी अनोखी विशेषताओं के चलते चिल्का को 1981 में रामसर कन्वेंशन के तहत 'अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि' का दर्जा प्राप्त हुआ। यह भारत की पहली वेटलैंड है जिसे यह सम्मान मिला।

चिल्का न केवल पर्यावरण के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यटन के लिए भी एक प्रमुख आकर्षण है। यहाँ मछली पकड़ना, डॉल्फिन देखना और नेचर ट्रेल्स जैसे आकर्षण पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यह लैगून ओडिशा के पुरी, खुर्दा और गंजाम जिलों में फैला हुआ है। मौसम के अनुसार इसका जल क्षेत्र बदलता है। मानसून के समय यह लगभग 1165 वर्ग किलोमीटर तक फैल जाता है, जबकि गर्मियों में यह घटकर करीब 906 वर्ग किलोमीटर रह जाता है।

चिल्का झील लंबे समय से इरावदी डॉल्फिन का प्राकृतिक आवास है। इस प्रजाति का नाम म्यांमार की अय्यरवाडी नदी के नाम पर पड़ा है। यह एक छोटी प्रजाति की डॉल्फिन है जो एशिया के तटीय और मुहाना क्षेत्रों में पाई जाती है। ओडिशा के तट पर पाई जाने वाली दस डॉल्फिन प्रजातियों में से इरावदी डॉल्फिन ही एकमात्र प्रजाति है जो चिल्का झील के भीतर पाई जाती है। चिल्का के अलावा ये डॉल्फिन गहिरमाथा और भितरकनिका के तटीय इलाकों में भी देखी जाती हैं।

इस वर्ष की डॉल्फिन गणना के संबंध में चिल्का वन्यजीव प्रभाग के सहायक वन संरक्षक सौम्य रंजन साहू ने जानकारी दी कि कुल 18 टीमें विभिन्न सेक्टरों में कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि गणना से पहले सतपड़ा और बलूगांव में दो प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए, जहां टीमों को व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। इस गणना में बोट आधारित ट्रांसेक्ट विधि का उपयोग किया जा रहा है। इसमें पहले से तय मार्गों पर नावें चलायी जाती हैं और उसी मार्ग को तीन बार दोहराया जाता है ताकि सटीक आंकड़े मिल सकें।

सभी 18 टीमें एक ही समय पर अपने-अपने निर्धारित मार्गों पर रवाना हुईं। टीमों को हैंडहेल्ड जीपीएस, रेंज फाइंडर, दूरबीन, कैमरे और डेटा रिकॉर्ड करने के लिए विशेष फॉर्मेट दिए गए हैं। अधिकांश टीमें सतपड़ा क्षेत्र से शुरू हुईं, जबकि एक टीम दूसरे स्थान से रवाना हुई। पहले दिन का सर्वेक्षण पूरा हो चुका है और अगले दो दिन यह प्रक्रिया जारी रहेगी। उसके बाद सभी आंकड़ों का विश्लेषण किया जाएगा। पिछले वर्ष इरावदी डॉल्फिन के साथ-साथ हंपबैक डॉल्फिन भी देखी गई थीं। कभी-कभी अन्य प्रजातियाँ भी दिखाई देती हैं, जो पानी के स्तर और मौसम पर निर्भर करती हैं।

सौम्य रंजन साहू ने आम लोगों और पर्यटकों से विशेष अपील की है। उन्होंने कहा कि चिल्का और उसके आसपास सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग न करें। झील के भीतर या किनारे प्लास्टिक कचरा फेंकना पर्यावरण और जलीय जीवों के लिए अत्यधिक हानिकारक है। उन्होंने बताया कि पर्यटकों की सुविधा के लिए निर्धारित स्थानों पर डस्टबिन लगाए गए हैं, जहाँ कचरा डाला जा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब डॉल्फिन दिखाई दें, तो पर्यटक नाव चालकों से उनके पास जाने की जिद न करें। बहुत नजदीक जाने से डॉल्फिन की प्राकृतिक जीवनशैली प्रभावित होती है और यह उनके लिए खतरनाक हो सकता है।

इस बीच, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया की प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर साध्वी सिंधुरा ने भी इस सर्वेक्षण की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आज आठ टीमें इस क्षेत्र से निकलीं और सभी टीमें वैज्ञानिक शोध पर आधारित तय मार्गों पर ही सर्वे करती हैं। हर टीम एक मानक फ़ॉर्मेट में डॉल्फिन की गतिविधियों को रिकॉर्ड करती है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य है। यह सर्वे भले ही एक दिन में पूरा हो जाता है, लेकिन दरअसल यह एक दीर्घकालिक निगरानी प्रणाली का हिस्सा है, जिससे झील और डॉल्फिन के स्वास्थ्य को समझा जा सके।

साध्वी सिंधुरा ने कहा कि डॉल्फिन की संख्या और उनकी सेहत यह दर्शाती है कि चिल्का झील कितनी सुरक्षित और स्वस्थ है। अगर डॉल्फिन सुरक्षित हैं, तो इसका मतलब है कि झील का पारिस्थितिकी तंत्र भी ठीक है। इससे मछुआरों और पर्यटन से जुड़े लोगों की आजीविका भी जुड़ी हुई है। इसलिए डॉल्फिन की सुरक्षा केवल वन्यजीव संरक्षण का मामला नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है।

Point of View

बल्कि यह स्थानीय समुदायों की आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित करता है। जब डॉल्फिन सुरक्षित होती हैं, तो यह दर्शाता है कि चिल्का झील का पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ है, जो मछुआरों और पर्यटन से जुड़े लोगों की आजीविका का आधार है।
NationPress
21/01/2026

Frequently Asked Questions

चिल्का झील में डॉल्फिन गणना का उद्देश्य क्या है?
इस गणना का उद्देश्य इरावदी डॉल्फिन की संख्या और उनके स्वास्थ्य का आकलन करना है, जो चिल्का झील के पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति को दर्शाता है।
डॉल्फिन गणना कब तक चलेगी?
डॉल्फिन गणना तीन दिन तक चलेगी, जिसमें 18 टीमें विभिन्न सेक्टरों में सर्वेक्षण करेंगी।
क्या पर्यटक डॉल्फिन के पास जा सकते हैं?
पर्यटकों को डॉल्फिन के पास जाने की जिद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे उनकी प्राकृतिक जीवनशैली प्रभावित हो सकती है।
चिल्का झील का महत्व क्या है?
चिल्का झील पर्यावरण, पर्यटन और स्थानीय समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है और यहाँ विभिन्न प्रवासी पक्षियों का आश्रय है।
क्या चिल्का झील को बचाने के लिए क्या किया जा रहा है?
चिल्का झील को बचाने के लिए लोगों को सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग न करने और प्लास्टिक कचरा उचित स्थान पर डालने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
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