अशोक गहलोत का आरोप: चुनावों में देरी से संवैधानिक ढांचे को खतरा
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जयपुर, 14 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य में शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) और पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में हो रही देरी के संदर्भ में राष्ट्रपति मुर्मु और राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग की है।
गहलोत ने मीडिया को संबोधित करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार जानबूझकर इन चुनावों को स्थगित कर रही है और इसे संवैधानिक संकट करार दिया।
उन्होंने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं और यूएलबी के चुनाव समय पर कराना बीआर अंबेडकर के दृष्टिकोण पर आधारित एक संवैधानिक दायित्व है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार निर्धारित समय पर चुनाव कराने में असफल रहती है, तो सत्ता में बने रहने का उसका नैतिक अधिकार क्या है?
गहलोत ने अंबेडकर जयंती मनाने के बावजूद भाजपा की आलोचना की और कहा कि उनके संवैधानिक सिद्धांतों की अनदेखी की जा रही है। उनके अनुसार, पंचायत, नगर पालिका और सहकारी समितियां जमीनी लोकतंत्र की रीढ़ हैं।
उन्होंने बताया कि पंचायत और नगर पालिका चुनाव तो लंबित हैं, साथ ही सहकारी समितियों के चुनाव भी नहीं हुए हैं।
गहलोत ने चिंताओं को व्यक्त करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों ने इन चुनावों को निर्धारित समय सीमा के भीतर, कथित तौर पर अप्रैल तक, कराने के स्पष्ट निर्देश दिए थे।
उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक निर्देशों के बावजूद चुनाव नहीं हुए हैं, जिससे गंभीर प्रश्न उठते हैं और संवैधानिक व्यवस्था के टूटने का संकेत मिलता है।
गहलोत ने सत्ता में बैठे लोगों पर संवैधानिक मूल्यों में सच्ची आस्था न रखने का आरोप भी लगाया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बार-बार 'संविधान बचाओ' का नारा लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने को लेकर बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है।
उन्होंने आगे कहा कि कही गई बातों और किए गए कार्यों में स्पष्ट अंतर है।
विडंबना को उजागर करते हुए गहलोत ने कहा कि जहां एक ओर राजनीतिक हलकों के नेता 14 अप्रैल को अंबेडकर की जयंती मनाते हैं, वहीं उनके कार्य अक्सर उनके आदर्शों के विपरीत होते हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करना और चुनावों में देरी करना भारत के संवैधानिक ढांचे की नींव को कमजोर करता है।