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कैंसर दवाओं पर 30% मार्जिन कैप: मरीजों को ₹2,500 करोड़ सालाना बचत का अनुमान, 70% तक घट सकती हैं कीमतें

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कैंसर दवाओं पर 30% मार्जिन कैप: मरीजों को ₹2,500 करोड़ सालाना बचत का अनुमान, 70% तक घट सकती हैं कीमतें

सारांश

कैंसर दवाओं पर 700% तक मार्जिन — अब सरकार ने 30% की कड़ी सीमा लगा दी है। 2019 के सीमित प्रयोग को अब बड़े पैमाने पर दोहराया जा रहा है। ₹2,500 करोड़ सालाना बचत का अनुमान है, पर असली परीक्षा DGHS की विशेषज्ञ सूची और NPPA की अधिसूचना के बाद होगी।

मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन को MRP के 30% तक सीमित करने को मंजूरी दी।
सरकारी अनुमान के अनुसार, कुछ दवाओं की कीमतों में 70% तक कमी और मरीजों को सालाना ₹2,500 करोड़ की बचत होगी।
NPPA के विश्लेषण में पाया गया कि कुछ दवाओं पर मार्जिन 700% से भी अधिक था।
फरवरी 2019 में 42 दवाओं पर इसी मॉडल से 526 ब्रांडों पर ₹984 करोड़ सालाना बचत हुई थी; नई व्यवस्था उसका विस्तार है।
DGHS की विशेषज्ञ समिति दवाओं की सूची तैयार करेगी, इसके बाद NPPA अंतिम अधिसूचना जारी करेगा।
नई व्यवस्था ब्रांडेड, जेनेरिक, घरेलू, आयातित, पेटेंट और गैर-पेटेंट — सभी श्रेणियों की दवाओं पर लागू होगी।

केंद्र सरकार ने 9 अक्टूबर 2026 को कैंसर उपचार को किफायती बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30 प्रतिशत तक निर्धारित करने को मंजूरी दे दी है। सरकारी अनुमान के अनुसार, इस निर्णय से कुछ दवाओं की कीमतों में 70 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और मरीजों को हर साल लगभग ₹2,500 करोड़ की बचत होगी।

मुख्य घटनाक्रम

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषधि विभाग द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, अब तक आवश्यक कैंसर दवाएं — जो अनुसूचित सूची में शामिल हैं — पहले से ही सरकार द्वारा तय अधिकतम कीमतों के दायरे में आती थीं। परंतु बड़ी संख्या में ऐसी कैंसर दवाएं भी बाज़ार में उपलब्ध हैं जो इस सूची से बाहर हैं और जिन पर प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण लागू नहीं होता।

नई व्यवस्था इन्हीं गैर-अनुसूचित दवाओं पर अप्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण का ढाँचा तैयार करती है, ताकि सप्लाई चेन में निर्माता से मरीज तक पहुँचते-पहुँचते दवा की कीमत में अत्यधिक वृद्धि न हो सके। नई व्यवस्था ब्रांडेड और जेनेरिक, तथा घरेलू और आयातित — पेटेंट और गैर-पेटेंट सभी श्रेणियों की दवाओं पर लागू होगी।

कीमतों की विसंगति — एनपीपीए का विश्लेषण

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) के विश्लेषण में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर औसतन 170 प्रतिशत तक मूल्य वृद्धि दर्ज की गई, जबकि कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी 700 प्रतिशत से भी अधिक तक पहुँच जाती है।

इसके अलावा, एक ही दवा की कीमत खुदरा मेडिकल स्टोर, अस्पताल फार्मेसी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग पाई गई — जो व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाती है। गौरतलब है कि भारत में प्रति एक लाख आबादी पर लगभग 60 लोग कैंसर से प्रभावित हैं और इलाज की ऊंची लागत कई परिवारों के लिए आर्थिक बर्बादी का कारण बनती है।

2019 के मॉडल का व्यापक विस्तार

यह पहली बार नहीं है कि सरकार ने इस दिशा में कदम उठाया है। फरवरी 2019 में NPPA ने 42 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा तय की थी, जिससे कुछ दवाओं की कीमतों में 91 प्रतिशत तक की कमी आई थी। उस कदम से 526 ब्रांडों पर सालाना लगभग ₹984 करोड़ की बचत हुई थी। अब उसी सिद्ध मॉडल को व्यापक स्तर पर लागू करते हुए कहीं अधिक दवाओं को मूल्य सुरक्षा के दायरे में लाया जा रहा है।

महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक सहित कई राज्यों के अधिकारियों, मरीज समूहों और सामाजिक संगठनों ने लंबे समय से कैंसर दवाओं की ऊंची कीमतों को लेकर चिंता जताई थी। उनकी मुख्य आपत्ति यह थी कि दवाओं की खरीद कीमत और उपभोक्ताओं से वसूले जाने वाले MRP के बीच का अंतर न्यायसंगत नहीं है।

कार्यान्वयन की प्रक्रिया

बयान के अनुसार, स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के अंतर्गत एक विशेषज्ञ समिति उन दवाओं की सूची तैयार करेगी जिन्हें इस व्यवस्था में शामिल किया जाएगा। इसके बाद NPPA अंतिम अधिसूचना जारी करेगा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं का उत्पादन करने वाली कंपनियों को अपने मौजूदा उत्पादन स्तर बनाए रखने होंगे, ताकि मूल्य नियंत्रण के साथ-साथ दवाओं की उपलब्धता भी सुनिश्चित रहे।

आम जनता पर असर

सरकार का मानना है कि नई सीमा लागू होने के बाद अनुचित मुनाफाखोरी पर लगाम लगेगी और मरीजों को अधिक न्यायसंगत कीमतों पर दवाएं मिल सकेंगी। इससे इलाज पर होने वाला जेब से खर्च (Out-of-Pocket Expenditure) भी घटने की उम्मीद है, जो भारत में स्वास्थ्य वित्तपोषण की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। विशेषज्ञ समिति की सूची जारी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन-किन दवाओं पर और कितनी राहत मिलेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली चुनौती DGHS की विशेषज्ञ सूची की व्यापकता और NPPA की अधिसूचना की गति में होगी। जब तक यह सूची सार्वजनिक नहीं होती, '70% कमी' और '₹2,500 करोड़ बचत' के आँकड़े केवल अनुमान ही रहेंगे। एक और जोखिम है — मूल्य नियंत्रण के जवाब में कंपनियाँ कभी-कभी दवाओं की उपलब्धता घटा देती हैं; इसीलिए उत्पादन स्तर बनाए रखने की शर्त महत्वपूर्ण है, पर उसे लागू करने का तंत्र अभी स्पष्ट नहीं हुआ है।
RashtraPress
9 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सरकार ने कैंसर दवाओं पर मार्जिन कैप क्यों लगाया है?
NPPA के विश्लेषण में पाया गया कि गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर औसतन 170% और कुछ मामलों में 700% से अधिक मार्जिन लिया जा रहा था, जो मरीजों पर भारी आर्थिक बोझ डाल रहा था। सरकार ने MRP के 30% की अधिकतम सीमा तय कर इस अनुचित मुनाफाखोरी पर लगाम लगाने का फैसला किया है।
30% मार्जिन कैप से मरीजों को कितनी बचत होगी?
सरकारी अनुमान के अनुसार, इस कदम से मरीजों को सालाना लगभग ₹2,500 करोड़ की बचत होगी और कुछ दवाओं की कीमतों में 70% तक की कमी आ सकती है। हालाँकि, सटीक लाभ DGHS की विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार की जाने वाली अंतिम दवा सूची पर निर्भर करेगा।
यह नई व्यवस्था किन दवाओं पर लागू होगी?
यह व्यवस्था उन गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर लागू होगी जो अभी तक सरकार के प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण से बाहर थीं। इसमें ब्रांडेड और जेनेरिक, घरेलू और आयातित, तथा पेटेंट और गैर-पेटेंट — सभी श्रेणियाँ शामिल होंगी। DGHS की विशेषज्ञ समिति पात्र दवाओं की सूची तैयार करेगी।
नई कैंसर दवा मूल्य नीति कब लागू होगी?
सरकार ने अनुमोदन दे दिया है, लेकिन DGHS के अंतर्गत विशेषज्ञ समिति पहले दवाओं की सूची बनाएगी, जिसके बाद NPPA अंतिम अधिसूचना जारी करेगा। अधिसूचना की सटीक तारीख अभी घोषित नहीं की गई है।
2019 की कैंसर दवा मार्जिन कैप नीति से यह कैसे अलग है?
फरवरी 2019 में NPPA ने केवल 42 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन सीमित किया था, जिससे 526 ब्रांडों पर सालाना ₹984 करोड़ की बचत हुई थी। नई व्यवस्था उसी मॉडल का व्यापक विस्तार है, जिसमें कहीं अधिक दवाएं शामिल होंगी और अनुमानित बचत भी ढाई गुना से अधिक है।
राष्ट्र प्रेस
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