कैंसर दवाओं की कीमत नियंत्रण पर कर्नाटक का समर्थन, हृदय-किडनी दवाओं को भी दायरे में लाने की माँग
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री यू.टी. खादर ने कैंसर सहित आवश्यक दवाओं पर अत्यधिक मुनाफाखोरी के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों का खुले दिल से स्वागत किया है और केंद्र सरकार से दवाओं की कीमतें तर्कसंगत बनाने के उपाय तत्काल लागू करने की अपील की है। साथ ही, उन्होंने यह भी माँग की है कि हृदय एवं किडनी रोगों के उपचार में प्रयुक्त महँगी जीवनरक्षक दवाओं को भी मूल्य-नियंत्रण के दायरे में शामिल किया जाए। 10 अक्टूबर 2026 को कर्नाटक के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन आयुक्त की ओर से जारी आधिकारिक बयान में राज्य का यह रुख स्पष्ट किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी और पृष्ठभूमि
सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल उठाया था कि कैंसर सहित आवश्यक दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी), खुदरा विक्रेता को मिलने वाली कीमत (पीटीआर) से 16 प्रतिशत से अधिक क्यों नहीं हो सकता — जैसी व्यवस्था औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ), 2013 के तहत अनुसूचित दवाओं के लिए पहले से लागू है। न्यायालय ने दवाओं की खरीद कीमत और मरीज़ों से वसूली जाने वाली अंतिम राशि के बीच बड़े अंतर पर भी गहरी चिंता जताई।
गौरतलब है कि कर्नाटक ने इस विषय पर 23 सितंबर 2026 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा को पत्र लिखकर राष्ट्रीय स्तर पर तत्काल हस्तक्षेप की माँग की थी। राज्य में किए गए निरीक्षणों के दौरान दवाओं की लैंडिंग लागत और एमआरपी के बीच भारी अंतर उजागर हुआ था, जिसमें 253 दवाओं और चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों को चिन्हित किया गया था।
एनपीपीए की बैठक में अहम फैसला
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में 8 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की 283वीं और 151वीं संयुक्त बैठक में गैर-अनुसूचित कैंसररोधी दवाओं के व्यापारिक मार्जिन को तर्कसंगत बनाने के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दी गई।
डीपीसीओ, 2013 के पैराग्राफ 19 के तहत इस प्रस्ताव में चिन्हित गैर-अनुसूचित कैंसररोधी दवाओं पर एमआरपी का व्यापारिक मार्जिन 30 प्रतिशत तक सीमित करने की बात कही गई है। हालाँकि, इस दायरे में आने वाली दवाओं की अंतिम सूची तैयार होनी अभी बाकी है। केंद्र सरकार का अनुमान है कि इस कदम से कई कैंसररोधी दवाओं की एमआरपी में 20 से 70 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और करीब ₹2,500 करोड़ की सालाना बचत संभव है।
विशेषज्ञ समिति और आगे की प्रक्रिया
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) के तहत एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया गया है, जो यह सिफारिश करेगी कि किन कैंसररोधी दवाओं को मूल्य-नियंत्रण के अंतर्गत लाया जाना चाहिए। इस समिति को 14 अक्टूबर 2026 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने की उम्मीद है।
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है और इलाज का आर्थिक बोझ मध्यमवर्गीय परिवारों की बचत को चाट रहा है। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, एनपीपीए, राज्य सरकारों, अस्पतालों, बीमा कंपनियों और चिकित्सा विशेषज्ञों को मिलाकर एक अंतर-मंत्रालयी विशेषज्ञ समिति गठित करने का भी सुझाव दिया गया है।
कर्नाटक की पारदर्शिता पहल
कर्नाटक सरकार ने 1 अक्टूबर 2026 को स्वास्थ्य संस्थानों के लिए एक सर्कुलर जारी किया, जिसमें मरीज़ों को दिए जाने वाले बिल में दवाओं की लैंडिंग लागत और एमआरपी दोनों का उल्लेख करना अनिवार्य किया गया है। फिलहाल ये निर्देश परामर्शात्मक प्रकृति के हैं और 1 नवंबर 2026 से इन्हें बाध्यकारी रूप से लागू करने का प्रस्ताव है। राज्य ने दवाओं की खरीद लागत, एमआरपी और अतिरिक्त मार्जिन का खुलासा अनिवार्य करने तथा राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक अध्ययन कराने की सिफारिश भी की है।
राज्य की विस्तारित माँगें
कर्नाटक सरकार ने केंद्र से आग्रह किया है कि प्रस्तावित 30 प्रतिशत व्यापारिक मार्जिन सीमा को केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्नत कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी, हृदय रोग और किडनी की बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सभी महँगी जीवनरक्षक दवाओं पर भी लागू किया जाए। इसके अलावा एनपीपीए की मूल्य-निगरानी और प्रवर्तन शक्तियाँ मजबूत करने की माँग भी की गई है। यदि ये सुधार समयबद्ध और व्यापक रूप से लागू हुए, तो लाखों गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों को सीधी राहत मिल सकती है।