ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: इंडो-पैसिफिक में भारत की रणनीतिक बढ़त, चीन के लिए 'मलक्का डिलेमा' और गहरा होगा
सारांश
Key Takeaways
भारत का महत्वाकांक्षी ग्रेट निकोबार आइलैंड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की भू-रणनीतिक तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है — यह बात द संडे गार्जियन में प्रकाशित एक ताज़ा रिपोर्ट में रेखांकित की गई है। करीब 10 अरब डॉलर की लागत वाला यह प्रोजेक्ट भारत के सबसे दक्षिणी द्वीप को एक एकीकृत व्यापारिक एवं सैन्य केंद्र में तब्दील करने की योजना है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके सबसे बड़े भू-राजनीतिक निहितार्थ चीन की समुद्री रणनीति के लिए हैं।
प्रोजेक्ट की रणनीतिक स्थिति और भौगोलिक महत्व
ग्रेट निकोबार द्वीप दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक — मलक्का स्ट्रेट — के उत्तरी प्रवेश द्वार पर स्थित है। यह द्वीप सिंगापुर, पोर्ट क्लांग और कोलंबो से लगभग बराबर दूरी पर है, जो इसे एक अत्यंत मूल्यवान समुद्री नोड बनाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 700 किलोमीटर तक फैला अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भौगोलिक रूप से एक प्राकृतिक एयरक्राफ्ट कैरियर जैसा है, जो भारत को उसकी भूगोल से मिला एक अनूठा सामरिक लाभ है।
गौरतलब है कि यह महज़ निकटता नहीं है — ग्रेट निकोबार मलक्का स्ट्रेट के उत्तरी हिस्से पर एक तरह से प्रभावी निगरानी की स्थिति में है, जो किसी भी सैन्य या व्यापारिक दृष्टि से असाधारण लाभ प्रदान करता है।
चीन के लिए 'मलक्का डिलेमा' और गहरा होगा
रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक प्रभाव चीन पर पड़ेगा। चीन का बड़ा हिस्सा — तेल आपूर्ति और व्यापारिक माल — मलक्का स्ट्रेट से होकर गुज़रता है। इस निर्भरता को रणनीतिक भाषा में 'मलक्का डिलेमा' कहा जाता है, यानी एक ऐसी कमज़ोर कड़ी जिसे चीन दशकों से दूर करने की कोशिश कर रहा है।
यह ऐसे समय में आया है जब चीन हिंद महासागर में अपनी नौसैनिक उपस्थिति लगातार बढ़ा रहा है और श्रीलंका, पाकिस्तान तथा म्यांमार में बंदरगाह विकसित कर रहा है। भारत का यह कदम उस रणनीतिक घेराबंदी का प्रत्युत्तर माना जा रहा है।
सैन्य और लॉजिस्टिक्स लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेट निकोबार का विकास भारतीय नौसेना की पूर्वी हिंद महासागर में परिचालन क्षमता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाएगा। इससे सैन्य लॉजिस्टिक्स मज़बूत होगी और सिंगापुर तथा कोलंबो जैसे विदेशी बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता कम होगी। प्रोजेक्ट को इंडो-पैसिफिक में भारत की सक्रिय उपस्थिति सुनिश्चित करने की व्यापक राष्ट्रीय रणनीति का अभिन्न हिस्सा बताया जा रहा है।
आर्थिक और कनेक्टिविटी आयाम
रणनीतिक लाभ के साथ-साथ यह प्रोजेक्ट आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार, यह द्वीप एक बड़े अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स और ट्रेड हब के रूप में विकसित हो सकता है, जो वैश्विक शिपिंग ट्रैफिक को आकर्षित करे, स्थानीय रोज़गार के अवसर बढ़ाए और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को नई दिशा दे। यह भारत के दीर्घकालिक समुद्री विकास विज़न को भी मज़बूती प्रदान करेगा।
पर्यावरणीय मंज़ूरी और आगे की राह
रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट को आवश्यक स्वीकृतियाँ मिल चुकी हैं, जिनमें नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की मंज़ूरी भी शामिल है। ट्रिब्यूनल ने इसकी रणनीतिक अहमियत को स्वीकार करते हुए कुछ कड़ी पर्यावरणीय शर्तों के साथ इसे हरी झंडी दी है। यह प्रोजेक्ट अब क्रियान्वयन की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इंडो-पैसिफिक में भारत की समुद्री भूमिका को नई ऊँचाई देने की संभावना रखता है।