क्या गुजरात के कच्छ जिले का घेडी गांव जीरा खेती में एक मिसाल बन गया है?
सारांश
Key Takeaways
- जीरा खेती ने किसानों को आर्थिक समृद्धि की नई राह दिखाई है।
- राज्य सरकार की सहायता से किसानों को लाभ मिला है।
- घेडी गांव का उदाहरण अन्य क्षेत्रों के लिए प्रेरणा है।
कच्छ, 22 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। गुजरात के कच्छ जिले के वागड़ क्षेत्र में लहलहाती जीरे की फसल ने इस इलाके को देश-दुनिया में एक नई पहचान दिलाई है। विशेषकर रापर तालुका के घेडी गांव में अधिकांश किसान बड़े पैमाने पर जीरे की खेती कर रहे हैं।
इस रेगिस्तानी क्षेत्र की शुष्क जलवायु और कम वर्षा के कारण पारंपरिक फसलों की खेती चुनौतीपूर्ण रही है, लेकिन कम पानी में तैयार होने वाली जीरे की फसल ने किसानों के लिए नए अवसर खोले हैं।
कच्छ का यह क्षेत्र सीमावर्ती और मरुस्थलीय होने के कारण यहां सिंचाई के साधन सीमित हैं। ऐसे में किसानों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसल का चयन किया और जीरे की खेती की ओर रुख किया। राज्य सरकार ने भी इस पहल को प्रोत्साहित किया और बीज, खाद एवं कृषि यंत्रों पर सब्सिडी देकर किसानों का सहयोग किया। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में सरकार की इन पहलों का सकारात्मक असर अब जमीन पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
प्रगतिशील किसान महेशभाई मेर ने बताया कि गांव के अधिकांश किसान जीरे की बुवाई करते हैं क्योंकि इसका उत्पादन अच्छा होता है और बाजार में उचित कीमत मिलती है, जिससे मुनाफा भी संतोषजनक होता है।
वहीं, किसान वेलजीभाई मेर का कहना है कि जीरे की खेती से उनका जीवन स्तर बदला है। उन्हें जीरे के बीज पर सब्सिडी मिल रही है और सरकार की ओर से पानी की व्यवस्था भी की गई है, जिससे खेती और बेहतर हो पाई है।
रापर तालुका में बड़े रकबे में जीरे की खेती की जा रही है। कच्छ के रापर तालुका के कृषि अधिकारी भरत कुमार श्रीमाली ने बताया कि किसानों को कृषि यंत्र खरीदने पर सब्सिडी दी जा रही है और अब तक 1,600 किसानों को इसका लाभ मिल चुका है। इससे खेती की लागत कम हुई है और उत्पादन में वृद्धि हुई है।
वागड़ क्षेत्र में पैदा होने वाले जीरे की मांग देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी है। सीमावर्ती और रेगिस्तानी क्षेत्रों में जीरे की सफल पैदावार कर किसान आत्मनिर्भर बन रहे हैं। साथ ही सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए मार्केट लिंकेज के जरिए वे अपनी उपज को वैश्विक बाजार तक पहुंचाकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। जीरे की खेती ने कच्छ के इस सूखे इलाके को आर्थिक समृद्धि की नई राह पर अग्रसर कर दिया है।