हिमाचल प्रदेश: मछुआरों के लिए सुक्खू सरकार की नई पहल, जलाशयों की मछलियों के लिए एमएसपी

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हिमाचल प्रदेश: मछुआरों के लिए सुक्खू सरकार की नई पहल, जलाशयों की मछलियों के लिए एमएसपी

सारांश

हिमाचल प्रदेश की सरकार ने मछुआरों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए जलाशयों की मछलियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा की है। यह कदम मछुआरों के लिए स्थायी आमदनी का रास्ता खोलेगा।

Key Takeaways

  • जलाशयों की मछलियों के लिए एमएसपी 100 रुपए प्रति किलोग्राम तय किया गया है।
  • कीमत कम होने पर डीबीटी के जरिए सब्सिडी मिलेगी।
  • रॉयल्टी की दर को 15%25 से घटाकर 1%25 किया गया है।
  • इसके परिणामस्वरूप 6 हजार मछुआरों को लाभ होगा।
  • मत्स्य पालन उत्पादन में बढ़ोतरी की उम्मीद है।

शिमला, 12 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार ने जलाशयों में पकड़ी गई मछलियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा की है।

इस पहल का उद्देश्य मछुआरों को कीमतों में अचानक बदलावएमएसपी 100 रुपए प्रति किलोग्राम निर्धारित की गई है।

सरकार के एक बयान में कहा गया है कि यदि नीलामी में मछली की कीमत 100 रुपए प्रति किलोग्राम से कम होती है, तो डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के माध्यम से 20 रुपए प्रति किलोग्राम तक की सब्सिडी दी जाएगी।

इससे मछुआरों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा और प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी, क्योंकि सब्सिडी सीधे उन मछुआरों के बैंक खातों में जमा की जाएगी जो इसके हकदार हैं। मुख्यमंत्री ने जलाशयों से पकड़ी गई मछलियों पर लगने वाली रॉयल्टी की दर में भी भारी कमी का ऐलान किया है।

पहले रॉयल्टी की दर 15 प्रतिशत थी, जिसे घटाकर 7.5 प्रतिशत किया गया था, और अब इसे इस वित्त वर्ष में केवल 1 प्रतिशत तक लाने का निर्णय लिया गया है। इस फैसले से 6 हजार से अधिक जलाशयी मछुआरों को सीधा लाभ होगा, जिससे उनका आर्थिक बोझ कम होगा और उनकी कुल आमदनी में वृद्धि होगी।

हिमाचल प्रदेश में पांच प्रमुख जलाशय हैं: गोविंद सागर (बिलासपुर और ऊना), पोंग बांध (कांगड़ा), रणजीत सागर और चमेरा (चंबा), और कोल बांध (बिलासपुर)। गोविंद सागर, कोल बांध, रणजीत सागर और चमेरा जलाशयों में सिल्वर कार्प प्रमुख प्रजाति है, जबकि पोंग बांध में सिंघाड़ा मछली अधिक होती है।

अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियों में रोहू, कतला, मृगल, कॉमन कार्प और ग्रास कार्प शामिल हैं। केंद्रित नीतिगत हस्तक्षेपों और निरंतर प्रयासों, जैसे कि उन्नत फिंगरलिंग्स (70-100 मिमी) का वार्षिक भंडारण, के कारण जलाशयों में मछली उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।

जलाशयों से उत्पादन 2022-23 में 549.35 मीट्रिक टन से बढ़कर 2025-26 में 818.02 मीट्रिक टन हो गया है, जो इस क्षेत्र में एक मजबूत सकारात्मक गति को दर्शाता है।

सरकार का मानना है कि ऐसे प्रगतिशील नीतिगत उपायों से जलाशय मत्स्य पालन अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, टिकाऊ मत्स्य पालन प्रथाओं को बढ़ावा मिलेगा और जलाशय-आधारित गतिविधियों में मत्स्य पालन समुदायों की भागीदारी बढ़ेगी।

सरकार मत्स्य पालन के बुनियादी ढांचे का विस्तार करने, विपणन प्रणालियों में सुधार करने और मछुआरों और मछली पालकों के लिए बेहतर आजीविका के अवसर पैदा करने के लिए भी काम कर रही है।

राज्य में कुल मछली उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कुल मछली उत्पादन 2024-25 में 19,019 मीट्रिक टन से बढ़कर 2025-26 में 20,005 मीट्रिक टन हो गया है, जो मत्स्य पालन क्षेत्र में चल रही विकास पहलों के सकारात्मक प्रभाव को दर्शाता है। यह वृद्धि ग्रामीण रोजगार और राज्य की अर्थव्यवस्था में मत्स्य पालन के बढ़ते योगदान को उजागर करती है।

Point of View

बल्कि मत्स्य पालन क्षेत्र में स्थिरता भी लाएंगी।
NationPress
13/04/2026

Frequently Asked Questions

एमएसपी क्या है?
न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) वह कीमत है, जो सरकार किसानों या मछुआरों को उनके उत्पाद के लिए सुनिश्चित करती है।
मछुआरों को सब्सिडी कैसे मिलेगी?
अगर मछली की नीलामी में कीमत 100 रुपए प्रति किलोग्राम से कम होती है, तो सरकार सीधे उनके बैंक खातों में सब्सिडी भेजेगी।
रॉयल्टी की दर में बदलाव क्यों किया गया है?
रॉयल्टी की दर को घटाकर मछुआरों का आर्थिक बोझ कम करने और उनकी आमदनी बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया गया है।
जलाशयों में कौन-कौन सी मछलियाँ पाई जाती हैं?
जलाशयों में सिल्वर कार्प, रोहू, कतला, मृगल, कॉमन कार्प और ग्रास कार्प जैसी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
यह कदम मछुआरों के लिए कैसे फायदेमंद है?
यह कदम मछुआरों को स्थाई आमदनी, पारदर्शिता और उचित मूल्य सुनिचित करेगा।
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