क्या आईएमएफ बेलआउट को दोष देना पाकिस्तान की अपनी नाकामी को छिपाने का प्रयास है?
सारांश
Key Takeaways
- पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति गंभीर है।
- आईएमएफ को दोष देना समाधान नहीं है।
- आर्थिक सुधारों की आवश्यकता है।
- ऊर्जा लागत, नीतियों की अनिश्चितता प्रमुख समस्याएं हैं।
- सरकार को आर्थिक स्थिरता के लिए कदम उठाने चाहिए।
नई दिल्ली, 15 जनवरी (राष्ट्र प्रेस) एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति 25 करोड़ की जनसंख्या को स्थायी प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ने में असमर्थ है। देश के सभी 20 प्रमुख निर्यात उत्पादों और छह मुख्य निर्यात कारकों पर असर डालने वाली कई बाधाओं के चलते आर्थिक सुधार संभव नहीं हो पा रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) को दोष देना वास्तव में पाकिस्तान के लिए किसी समाधान का काम नहीं करेगा, क्योंकि देश लगभग हर आर्थिक पैमाने पर गंभीर संकट का सामना कर रहा है।
डॉन अखबार की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा गठित एक पैनल ने उद्योग जगत के हितधारकों से चर्चा के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा। यह पैनल अगले वर्ष के अंत में मौजूदा बेलआउट कार्यक्रम की अवधि समाप्त होने के बाद आईएमएफ कार्यक्रम से बाहर निकलने की योजना बनाने के लिए बनाया गया था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पैनल द्वारा “सरकार की ओर से आर्थिक सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू न कर पाने की जिम्मेदारी को आईएमएफ की सख्त वित्तीय शर्तों पर डालना, वास्तव में राज्य की अपनी कर्तव्यहीनता पर पर्दा डालने का प्रयास है।”
इसके अलावा, पैनल ने जिन कारणों का उल्लेख किया है, जैसे ऊर्जा की ऊंची और अस्थिर लागत, नीतियों की अनिश्चितता, विकृत कर प्रणाली, लॉजिस्टिक्स और व्यापार सुविधा में बाधाएं, ये कोई नए मुद्दे नहीं हैं।
रिपोर्ट में कहा गया, “इन समस्याओं का जिक्र पहले भी दानदाताओं, सरकारी रिपोर्टों और मीडिया विश्लेषणों में बार-बार होता रहा है।”
आईएमएफ ने सरकार को अनुकूल कारोबारी माहौल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया है। इसके विपरीत, रिपोर्ट के अनुसार, “पाकिस्तानी अधिकारी जड़ हो चुकी अर्थव्यवस्था के लिए आईएमएफ कार्यक्रम को दोषी ठहरा रहे हैं, ताकि अपनी अक्षमता को छिपाया जा सके और सत्तारूढ़ दल की उस अनिच्छा पर पर्दा डाला जा सके, जिसमें वह राजनीतिक संरक्षण प्राप्त किराया-खोरी के ढांचों को खत्म नहीं करना चाहता।”
डॉन की एक अन्य हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएमएफ की कठोर आर्थिक सोच पाकिस्तान को वर्षों तक कम-विकास के जाल में फंसा सकती है। मौजूदा रणनीति पर बुनियादी पुनर्विचार और लागू की जा रही दिखावटी वित्तीय सख्ती में बदलाव के बिना, अर्थव्यवस्था लंबे समय तक प्रभावित रहेगी और आम पाकिस्तानी इसके दुष्परिणाम भुगतते रहेंगे।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 से अब तक मौजूदा सरकार ने आईएमएफ की निगरानी में “कठोर मितव्ययिता नीतियों के जरिए आम पाकिस्तानियों पर भारी बोझ” डाला है।
इसमें कहा गया, “सरकार ने अपने या अपने समर्थकों के खर्च में किसी तरह की कटौती करने के बजाय भारी करों और सब्सिडी में कटौती के जरिए बड़े पैमाने पर वित्तीय समायोजन किया है,” जो आम जनता के लिए और अधिक पीड़ादायक साबित हुआ है।