क्या भारत के केंद्रीय बजट में स्थिरता, तकनीक और रोजगार पर फोकस रहेगा? : विशेषज्ञ
सारांश
Key Takeaways
- सरकार का ध्यान राजकोषीय मजबूती और मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता पर रहेगा।
- ग्रामीण रोजगार योजना में सुधार पर जोर दिया जाएगा।
- भारत नए व्यापार साझेदारों की ओर बढ़ सकता है।
वाशिंगटन, 16 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। आने वाले केंद्रीय बजट को लेकर विशेषज्ञों की राय है कि सरकार अपनी वर्तमान दिशा में ही आगे बढ़ेगी। ओआरएफ अमेरिका के वरिष्ठ शोधकर्ता अनित मुखर्जी के अनुसार, भारत का अगला केंद्रीय बजट मुख्यतः मौजूदा नीतियों को बनाए रखने की संभावना है, जिसमें सरकार राजकोषीय मजबूती, मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता और हाई-टेक्नोलॉजी क्षेत्र में बढ़ते निवेश पर ध्यान केंद्रित करेगी।
अनित मुखर्जी ने समाचार एजेंसी राष्ट्र प्रेस से बातचीत में कहा कि यह सरकार के कार्यकाल का मध्य समय है, इसलिए बजट में किसी बड़े बदलाव की अपेक्षा नहीं है और पहले जैसी नीतियों को ही आगे बढ़ाया जाएगा। उनके मुताबिक, आने वाला बजट निरंतरता का संकेत देगा।
उन्होंने हाल की घोषणाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार धीरे-धीरे सुधार कर रही है। इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण ग्रामीण रोजगार से जुड़ी योजना है, जिसे पहले मनरेगा के नाम से जाना जाता था। अब इस योजना का स्वरूप बदला जा रहा है और इसे सीधे पैसे देने वाली योजना के बजाय आजीविका से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
मुखर्जी ने कहा, "कुछ घोषणाएं पहले ही हो चुकी हैं, जो काफी महत्वपूर्ण हैं। अब यह योजना रोजगार और आजीविका के अवसर बढ़ाने पर केंद्रित हो रही है, न कि केवल लाभ हस्तांतरण तक सीमित रहेगी।"
राजकोषीय स्थिति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि जीएसटी में हाल की कटौती के बावजूद सरकार की आय में बढ़ोतरी बनी रह सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि देश का बाहरी व्यापार क्षेत्र फिलहाल स्थिर है, जिससे आगे के लिए आशा की गुंजाइश है।
उनके अनुसार, यदि वैश्विक व्यापार में बदलाव होते हैं और भारत कुछ पारंपरिक व्यापार समूहों से हटकर नए देशों के साथ व्यापार बढ़ाता है, तो यह देश के लिए फायदेमंद हो सकता है। विशेषकर अमेरिका की बजाय अन्य देशों की ओर व्यापार बढ़ने से चालू खाते की स्थिति में सुधार हो सकता है।
कुल मिलाकर, मुखर्जी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि वित्त मंत्री मुख्य मैक्रोइकोनॉमिक उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित रखेंगे। उन्होंने कहा, "मुझे उम्मीद है कि वित्त मंत्री लक्ष्य पर नजर रखेंगे।" उन्होंने उभरते और रणनीतिक क्षेत्रों में निरंतर सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने राष्ट्र प्रेस को बताया, "हम हाई टेक्नोलॉजी, एआई, जैसे कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण निवेश करने के लिए तैयार हैं, जहाँ भारतीय प्रतिस्पर्धात्मकता पहले से ही दिख रही है और उन क्षेत्रों में और अधिक निवेश की आवश्यकता होगी।"
मुखर्जी ने संशोधित ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम में बदलावों पर भी अपनी राय दी, जिसमें उन्होंने कई भारतीय राज्यों में इसके प्रभाव का अध्ययन करने के अपने अनुभव का उपयोग किया। उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट लगभग 20 वर्षों से चल रहा था और इसके मुख्य ढांचे में बहुत कम बदलाव हुआ था, जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था और श्रम बाजार की आवश्यकताएँ बदल गई थीं।
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि अगर आप देखें कि यह प्रोग्राम कितने समय से चल रहा था, लगभग 20 साल हो गए हैं। सामान्य ढांचा... नहीं बदला है, इसलिए बदलाव का समय आ गया था क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था बदल गई है, आवश्यकताएँ बदल गई हैं।"
उन्होंने इन सुधारों को सही दिशा में उठाया गया कदम बताया। उनके अनुसार, इससे आंकड़ों और प्रबंधन व्यवस्था को आधुनिक बनाया जा रहा है और राज्यों को इसे लागू करने में अधिक स्वतंत्रता मिलेगी। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि योजना के मूल उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए।
मुखर्जी ने याद दिलाया कि इस योजना का मकसद लोगों को उस समय रोजगार देना था जब उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है, जैसे खेती के खाली मौसम में या सूखे की स्थिति में। जलवायु परिवर्तन के दौर में रोजगार की गारंटी का यह पहलू आगे भी बेहद महत्वपूर्ण रहेगा, भले ही काम का स्वरूप बदल जाए।
उन्होंने अमेरिका की व्यापार और शुल्क नीतियों के असर पर भी बात की। उनका कहना था कि इनका तात्कालिक असर पहले ही दिखाई देने लगा है, क्योंकि ये शुल्क कई महीने पहले लागू किए जा चुके हैं। हालांकि सरकार ने घरेलू उद्योग को राहत देने के लिए कदम भी उठाए हैं। मुखर्जी ने भारत और अमेरिका के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर उम्मीद जताई।
उन्होंने बताया, "एफटीए को लेकर आशा है। यदि ऐसा कोई समझौता होता है, तो इससे भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजार के माहौल पर सकारात्मक असर पड़ेगा।"