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कान्हा टाइगर रिजर्व में 9 दिनों में बाघिन T-141 समेत 5 बाघों की मौत, CDV संक्रमण की जांच जारी

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कान्हा टाइगर रिजर्व में 9 दिनों में बाघिन T-141 समेत 5 बाघों की मौत, CDV संक्रमण की जांच जारी

सारांश

कान्हा टाइगर रिजर्व में नौ दिनों के भीतर बाघिन T-141 और उसके चार शावकों की मौत ने देश की बाघ संरक्षण व्यवस्था को झकझोर दिया है। संदिग्ध कैनाइन डिस्टेंपर वायरस न केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे रिजर्व की जैव सुरक्षा का सवाल खड़ा करता है।

मुख्य बातें

21 से 30 अप्रैल 2026 के बीच कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन T-141 और उसके 4 शावकों की मौत हुई।
शुरुआती जांच में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) को संभावित कारण माना जा रहा है; अंतिम पुष्टि बाकी।
तीसरे शावक का शव जबलपुर स्थित स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ भेजा गया है।
बाघिन T-141 और अंतिम शावक को मुक्की क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती किया गया था, जहाँ दोनों की मौत हुई।
फोरेंसिक रिपोर्ट के बाद NTCA द्वारा व्यापक स्वास्थ्य सर्वेक्षण की संभावना।

मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व की सरही रेंज में 21 अप्रैल से 30 अप्रैल 2026 के बीच महज नौ दिनों के भीतर बाघिन T-141 और उसके चार शावकों की मौत हो गई। शुरुआती जांच में मौतों की संभावित वजह कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) को माना जा रहा है, हालांकि अंतिम पुष्टि के लिए फोरेंसिक नमूनों का विश्लेषण अभी जारी है। देश के सबसे सुरक्षित बाघ आवासों में से एक माने जाने वाले इस रिजर्व में पूरे बाघ परिवार के खत्म होने की यह घटना भारत की वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।

घटनाक्रम: नौ दिनों में कैसे गया पूरा परिवार

21 अप्रैल को अमाही नाला क्षेत्र में पहला शावक मृत पाया गया। इसके तीन दिन बाद, 24 अप्रैल को दूसरा शावक सड़ी-गली अवस्था में मिला। 26 अप्रैल तक तीसरा शावक भी रहस्यमयी बीमारी का शिकार हो गया, जिसके बाद वन अधिकारियों ने बाघिन और चौथे शावक को बचाने के लिए आपातकालीन बचाव अभियान शुरू किया।

27 अप्रैल को गंभीर रूप से बीमार बाघिन T-141 और उसके आखिरी जीवित शावक को गहन देखभाल के लिए मुक्की क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती कराया गया। 28 अप्रैल को दोनों में सुधार के संकेत मिले और उन्होंने खाना-पीना भी शुरू किया, जिससे उम्मीद की किरण जगी। लेकिन मंगलवार रात स्थिति तेजी से बिगड़ी और बुधवार सुबह पहले बाघिन की, फिर उसके आखिरी शावक की भी मौत हो गई।

CDV: बाघों के लिए क्यों है यह वायरस इतना खतरनाक

विशेषज्ञों के अनुसार, कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) बाघों की आबादी के लिए सबसे घातक वायरल खतरों में से एक है। यह वायरस तेज़ी से फैलता है और इससे मृत्यु दर अत्यधिक ऊँची होती है। गौरतलब है कि CDV मुख्यतः कुत्तों और अन्य मांसाहारी जानवरों में पाया जाता है, और जंगली बाघों में इसके प्रसार का स्रोत अक्सर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के पालतू या आवारा कुत्ते होते हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी बाघ जनगणना में रिकॉर्ड संख्याओं का जश्न मना रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती बाघ आबादी और सिकुड़ते वन बफर ज़ोन के कारण संक्रामक रोगों का खतरा और बढ़ गया है।

फोरेंसिक जांच और नमूने

तीसरे शावक के शव को जबलपुर स्थित स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ भेजा गया है। बाघिन और अंतिम शावक के रक्त व ऊतक के नमूनों का विश्लेषण विशेष प्रयोगशालाओं में किया जा रहा है। पशु चिकित्सक और वन्यजीव फोरेंसिक विशेषज्ञ संक्रमण के स्रोत की पुष्टि करने में जुटे हैं।

वन्यजीव संरक्षण पर असर

कान्हा टाइगर रिजर्व को पारंपरिक रूप से देश के सबसे सुरक्षित और सुनियोजित बाघ आवासों में गिना जाता है। सरही रेंज से पूरे बाघ परिवार का इस तरह सफाया हो जाना उन अंतर्निहित कमजोरियों की कड़वी याद दिलाता है, जिनका सामना संक्रामक रोगों के मामले में सबसे प्रतिष्ठित अभयारण्यों को भी करना पड़ता है। यह घटना CDV के खिलाफ बाघ आबादी के लिए व्यापक टीकाकरण और निगरानी नीति पर बहस को नए सिरे से उठाने की माँग कर रही है।

आगे क्या होगा

फोरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद वन विभाग और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा रिजर्व में व्यापक स्वास्थ्य सर्वेक्षण किए जाने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि CDV की पुष्टि होने पर आसपास के बफर क्षेत्रों में पालतू पशुओं के टीकाकरण अभियान को तत्काल प्राथमिकता देनी होगी, ताकि इस संक्रमण की कड़ी को तोड़ा जा सके।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि संक्रामक रोगों के विरुद्ध जैव सुरक्षा ढाँचा कमज़ोर बना हुआ है। CDV का खतरा दशकों से ज्ञात है — अफ्रीका के सेरेंगेटी में 1994 में इसी वायरस ने सैकड़ों शेरों को मार डाला था — फिर भी भारत में बाघ आबादी के लिए कोई व्यापक टीकाकरण प्रोटोकॉल नहीं है। बफर ज़ोन में आवारा और पालतू कुत्तों की अनियंत्रित आवाजाही इस संक्रमण की सबसे संभावित कड़ी है, और यह नीतिगत चूक है। रिकॉर्ड बाघ संख्या का जश्न तब तक अधूरा है जब तक संक्रामक रोग प्रबंधन को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण एजेंडे में केंद्रीय स्थान नहीं मिलता।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन T-141 की मौत कैसे हुई?
बाघिन T-141 की मौत 30 अप्रैल 2026 को मुक्की क्वारंटाइन सेंटर में हुई, जहाँ उसे गंभीर बीमारी के बाद भर्ती किया गया था। शुरुआती जांच में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) को संभावित कारण माना जा रहा है, हालांकि फोरेंसिक रिपोर्ट का इंतज़ार है।
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) बाघों के लिए कितना खतरनाक है?
CDV बाघों और अन्य बड़ी बिल्लियों के लिए अत्यंत घातक वायरस है, जो तेज़ी से फैलता है और मृत्यु दर बहुत अधिक होती है। यह मुख्यतः पालतू या आवारा कुत्तों से जंगली जानवरों में फैलता है।
कान्हा में बाघों की मौत की फोरेंसिक जांच कहाँ हो रही है?
तीसरे शावक का शव जबलपुर स्थित स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ भेजा गया है। बाघिन और अंतिम शावक के रक्त व ऊतक नमूनों का विश्लेषण विशेष प्रयोगशालाओं में किया जा रहा है।
इन मौतों के बाद कान्हा टाइगर रिजर्व में क्या कदम उठाए जाएंगे?
फोरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद NTCA और वन विभाग द्वारा रिजर्व में व्यापक स्वास्थ्य सर्वेक्षण की संभावना है। CDV की पुष्टि होने पर बफर क्षेत्रों में पालतू पशुओं के टीकाकरण अभियान को प्राथमिकता दी जा सकती है।
क्या भारत के अन्य टाइगर रिजर्व में भी CDV का खतरा है?
विशेषज्ञों के अनुसार CDV का खतरा उन सभी रिजर्व में है जहाँ बफर ज़ोन में आवारा या पालतू कुत्तों की आवाजाही होती है। भारत में अभी तक बाघ आबादी के लिए कोई व्यापक CDV टीकाकरण नीति लागू नहीं है।
राष्ट्र प्रेस
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