गुजरात-महाराष्ट्र स्थापना दिवस: 1 मई 1960 को बॉम्बे राज्य के विभाजन की पूरी कहानी
सारांश
Key Takeaways
- 1 मई 1960 को बॉम्बे पुनर्गठन अधिनियम लागू होने से गुजरात और महाराष्ट्र अलग राज्य बने।
- जेवीपी कमेटी (नेहरू, पटेल, सीतारमैया) ने 1949 में भाषाई आधार पर राज्य-पुनर्गठन को अस्वीकार किया था।
- 8 अगस्त 1956 को अहमदाबाद में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई ने महागुजरात आंदोलन को नई धार दी।
- इंदुलाल याग्निक ने महागुजरात जनता परिषद की स्थापना कर गुजरात आंदोलन को नेतृत्व दिया।
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु बने, लेकिन गुजरात-महाराष्ट्र की माँग तब भी अधूरी रही।
- विभाजन में मुंबई महाराष्ट्र को और दांग क्षेत्र गुजरात को दिया गया।
बॉम्बे राज्य को भाषाई आधार पर विभाजित कर 1 मई 1960 को गुजरात और महाराष्ट्र नामक दो स्वतंत्र राज्यों का गठन किया गया — यह निर्णय वर्षों के उग्र आंदोलनों, पुलिस कार्रवाइयों और संसदीय बहसों के बाद संभव हो सका। बॉम्बे पुनर्गठन अधिनियम के लागू होते ही मराठी और गुजराती भाषी समुदायों की दशकों पुरानी माँग पूरी हुई। तब से प्रतिवर्ष 1 मई को दोनों राज्य अपना स्थापना दिवस मनाते हैं।
आज़ादी के बाद का राज्य-पुनर्गठन
भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली। इसके बाद देश की रियासतों को एकीकृत करने की ज़िम्मेदारी लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को सौंपी गई। 1947 में पश्चिमी भाग की रियासतों का विलय कर सौराष्ट्र, कच्छ और मुंबई — तीन राज्यों की स्थापना की गई। उस समय गुजराती और मराठी दोनों भाषाई समुदाय एक ही बॉम्बे राज्य के अंतर्गत थे।
भाषाई राज्यों की माँग और सरकारी समितियाँ
स्वतंत्रता के कुछ वर्षों बाद ही भाषाई आधार पर अलग राज्यों की माँग देशभर में उठने लगी। इसे शांत करने के लिए जून 1948 में सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसके धर की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई। दिसंबर 1948 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में इस समिति ने कहा कि राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुविधा के आधार पर होना चाहिए।
धर समिति की रिपोर्ट से आंदोलन और तेज़ हो गया। इसके जवाब में दिसंबर 1948 में ही एक और समिति बनाई गई, जिसमें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया शामिल थे। तीनों के नाम के पहले अक्षरों के आधार पर इसे जेवीपी कमेटी कहा गया। 1949 में इस समिति ने भी भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के विचार को अस्वीकार कर दिया। समाचार लेखों के अनुसार, उस समय कांग्रेस के आलोचक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी नेहरू के इस रुख का समर्थन किया था।
देशव्यापी भाषाई आंदोलनों का उभार
1949 तक देश के विभिन्न हिस्सों में भाषाई आंदोलन चरम पर पहुँच चुके थे। कन्नड़ भाषियों के लिए मैसूर, बॉम्बे और हैदराबाद में फैले क्षेत्रों को मिलाकर अलग राज्य की माँग हेतु ज्वाइंट कर्नाटक आंदोलन शुरू हुआ। इसके साथ ही महाराष्ट्र आंदोलन, मलयालम भाषियों की माँग और तेलुगु भाषियों का उग्र आंदोलन भी समानांतर चल रहा था।
इन दबावों के परिणामस्वरूप राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 के तहत कई नए राज्य बने — कन्नड़ भाषियों को कर्नाटक, तेलुगु भाषियों को आंध्र प्रदेश, मलयालम भाषियों को केरल और तमिल भाषियों को तमिलनाडु मिला। परंतु गुजराती और मराठी समुदायों की माँग अभी भी अधूरी थी — वे विरोधाभासी परिस्थितियों में बॉम्बे राज्य का हिस्सा बने रहे।
संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन और महागुजरात आंदोलन
इसके बाद संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन — जिसे सामान्यतः 'समिति' के नाम से जाना गया — ने 1956 से 1960 तक पश्चिमी और मध्य भारत में एक अलग मराठी भाषी राज्य की माँग की।
निर्णायक मोड़ 8 अगस्त 1956 को आया, जब अहमदाबाद के कुछ कॉलेज छात्र अलग राज्य की माँग लेकर लाल दरवाज़ा स्थित स्थानीय कांग्रेस कार्यालय पहुँचे। तत्कालीन नेता मोरारजी देसाई ने उनकी बात नहीं सुनी और पुलिस कार्रवाई में कई छात्रों की मौत हो गई। इस घटना का गहरा असर पूरे गुजरात पर पड़ा। इसके बाद इंदुलाल याग्निक सेवानिवृत्ति से वापस आए और आंदोलन को दिशा देने के लिए महागुजरात जनता परिषद की स्थापना की। आंदोलन के दौरान इंदुलाल याग्निक और दिनकर मेहता सहित कई प्रमुख आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया गया।
बॉम्बे पुनर्गठन अधिनियम और दो राज्यों का जन्म
दोनों पक्षों से बढ़ते आंदोलनों और कुछ मामलों में हिंसा की स्थिति को देखते हुए तत्कालीन केंद्र सरकार ने बॉम्बे पुनर्गठन अधिनियम तैयार करने का निर्णय लिया। संसद में विधेयक पारित होने के बाद यह कानून बना और 1 मई 1960 को लागू हुआ। इसके साथ ही गुजरात और महाराष्ट्र को बॉम्बे राज्य से अलग कर दिया गया। आर्थिक राजधानी मुंबई महाराष्ट्र को और दांग क्षेत्र गुजरात को दिया गया। गौरतलब है कि यह विभाजन भारतीय संसदीय लोकतंत्र का वह दुर्लभ उदाहरण है, जहाँ जन-आंदोलन ने सीधे नीति-निर्माण को प्रभावित किया। आज भी दोनों राज्य 1 मई को अपना स्थापना दिवस गर्व के साथ मनाते हैं।