क्या जैनेंद्र कुमार ने समाज नहीं, इंसान के 'मन' को साहित्य का केंद्र बनाया?
सारांश
Key Takeaways
- जैनेंद्र कुमार ने मानव मन की गहराइयों को उजागर किया।
- उनकी कृतियाँ सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देती हैं।
- उन्हें साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया।
- उनकी भाषा में पारदर्शिता और संक्षिप्तता है।
- जैनेंद्र ने हिंदी साहित्य को नई दिशा दी।
नई दिल्ली, 1 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। सोचिए एक ऐसे युवा की तस्वीर, जो समाज की समस्याओं पर बात नहीं करता। वह 'मन' की गहराइयों में उतरता है। वह उस सन्नाटे की बात करता है, जो तब उभरता है जब कोई इंसान प्रेम, त्याग और अपराध बोध के बीच झूल रहा होता है। यह युवा और कोई नहीं, बल्कि जैनेंद्र कुमार थे।
हिंदी साहित्य के 'मनोवैज्ञानिक चितेरे' जिन्होंने कहानियों को बाहरी दुनिया से निकालकर आत्मा की प्रयोगशाला में प्रस्तुत किया।
2 जनवरी 1905 को अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) के कौड़ियागंज में जन्मे आनंदी लाल, जिन्हें बाद में जैनेंद्र के नाम से जाना गया, का बचपन कठिनाइयों में बीता। जब वे मात्र दो वर्ष के थे, उनके पिता का निधन हो गया। माता और मामा की देखरेख में, उन्होंने हस्तिनापुर के 'ऋषभ ब्रह्मचर्याश्रम' में शिक्षा ग्रहण की। यहाँ जैन धर्म के 'अहिंसा' और 'अनेकांतवाद' के सिद्धांतों ने उनके विचारों की नींव रखी। यही कारण है कि उनके उपन्यासों में सत्य कभी सरल नहीं रहा, बल्कि वह जटिल और बहुआयामी बनकर उभरा।
जैनेंद्र केवल किताबी दार्शनिक नहीं थे। 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की, तो उन्होंने बीएचयू की पढ़ाई छोड़कर जेल जाने का फैसला किया। जेल की उन एकाकी कोठरियों में उन्होंने इंसान के अस्तित्व और उसकी नियति पर विचार करना शुरू किया। उनके लिए राष्ट्र की स्वतंत्रता केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं थी, बल्कि व्यक्ति की 'आत्मिक मुक्ति' थी।
जैनेंद्र कुमार के उपन्यासों ने अपने समय के रूढ़िवादी समाज में हलचल मचा दी। 1929 में जब उपन्यास 'परख' प्रकाशित हुआ, तो यह दिखाया कि एक विधवा की समस्या को कैसे नए दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। 1935 में आए 'सुनीता' ने जैसे तूफान खड़ा कर दिया। उपन्यास का वह दृश्य, जहाँ सुनीता एक क्रांतिकारी के अहंकार को तोड़ने के लिए अपने शारीरिक शुचिता का समर्पण करती है, आज भी हिंदी साहित्य के सबसे 'साहसी' प्रयोगों में गिना जाता है। यहाँ जैनेंद्र अश्लीलता नहीं, बल्कि देह के माध्यम से देह से ऊपर उठने का 'गांधीवादी प्रयोग' कर रहे थे।
इसी तरह, 'त्यागपत्र' (1937) की मृणाल, कोई अबला नारी नहीं थी, बल्कि वह समाज की थोपी हुई नैतिकता को ध्वस्त करने वाली एक सशक्त आत्मा थी। उसका 'त्याग' समाज के लिए नहीं, बल्कि अपने 'निजत्व' को बचाने के लिए था। जैनेंद्र ने दिखाया कि असली अपराधी वह नहीं जो समाज के नियम तोड़ता है, बल्कि वह समाज है जो एक संवेदनशील आत्मा का गला घोंट देता है।
जैनेंद्र की कहानियाँ केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि 'मानव मन की हलचल' का दस्तावेज हैं। 'पाजेब' पढ़ते हुए हर पाठक उस बच्चे (आशुतोष) के साथ खुद को खड़ा पाता है, जिस पर संदेह की सुई घूम रही है। वे बड़े लोगों के अहंकार को बेनकाब करते हैं जो बच्चों के मासूम मन को कुचल देते हैं। वहीं 'नीलम देश की राजकन्या' जैसी कहानियों में वे इंसान के उस शाश्वत अकेलेपन को छूते हैं, जहाँ बाहर सब कुछ है, लेकिन भीतर एक बुझती नहीं प्यास है।
आलोचकों का कहना है कि प्रेमचंद 'समाज' के लेखक थे, जबकि जैनेंद्र 'व्यक्ति' के, लेकिन सच्चाई यह है कि प्रेमचंद ने भारत का 'बाहरी ढांचा' दिखाया, तो जैनेंद्र ने उस ढांचे के भीतर रहने वाले इंसान की 'धड़कन' सुनाई। जैनेंद्र की भाषा अद्वितीय थी। टूटी हुई, संक्षिप्त, सांकेतिक, जैसे कोई खुद से बातें कर रहा हो। उन्होंने हिंदी गद्य को वह 'पारदर्शिता' दी, जिसके बिना 'अज्ञेय' या 'निर्मल वर्मा' जैसे लेखकों का अस्तित्व संभव नहीं था।
उन्हें 'साहित्य अकादमी' (मुक्तिबोध के लिए), 'पद्म भूषण' और साहित्य अकादमी की सर्वोच्च फेलोशिप से सम्मानित किया गया। 24 दिसंबर 1988 को दिल्ली में उनका निधन हुआ।