क्या जेम्स लेन मामले में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने माफी मांगी?
सारांश
Key Takeaways
- ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने माफी मांगी है।
- मामला 2003 में शुरू हुआ था।
- उदयनराजे भोसले को पत्र भेजा गया है।
- माफी पत्र में छत्रपति शिवाजी महाराज का सम्मान व्यक्त किया गया है।
- यह विवाद 2004 में बढ़ा था।
मुंबई, 7 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिकी लेखक जेम्स लेन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण घटना सामने आई है। छत्रपति शिवाजी महाराज और राजमाता जिजाऊ की मानहानि के संदर्भ में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है। इसके साथ ही, माफीनामा बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल किया गया है और 20 वर्षों बाद सतारा से संसद सदस्य उदयनराज को एक पत्र भेजा गया है।
यह विवाद 2003 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस इंडिया द्वारा प्रकाशित जेम्स विलियम लेन की पुस्तक 'शिवाजी: हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया' से प्रारंभ हुआ। आरोप है कि पुस्तक के कुछ अंश छत्रपति शिवाजी महाराज और राजमाता जिजाऊ की छवि को ठेस पहुंचाते हैं। इस पर सतारा के माननीय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में अपहरण संख्या 3230/2004 के तहत एक व्यक्तिगत शिकायत दर्ज की गई थी।
सुनवाई के बाद, 2 अप्रैल 2005 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, सतारा ने आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया। इसके बाद, बचाव पक्ष ने हाईकोर्ट में आपराधिक रिट याचिकाएं दायर की थीं।
बचाव पक्ष में सैयद मंजर खान (संपादक, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस इंडिया), डॉ. श्रीकांत बहुलेकर (संस्कृत प्रोफेसर, तिलक महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, पुणे), सुचेता परांजपे (प्रोफेसर, तिलक महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, पुणे) और वीएल मंजुल (लाइब्रेरियन, भंडारकर संस्थान) शामिल थे।
ये याचिकाएं 17 दिसंबर 2025 को कोल्हापुर सर्किट बेंच में न्यायमूर्ति शिवकुमार एस दिगे के समक्ष प्रस्तुत की गईं। सुनवाई के दौरान, आरोपियों के वकीलों ने अदालत को बताया कि वे शिकायतकर्ता (श्रीमंत छत्रपति उदयनराजे भोसले) से माफी मांगने को तैयार हैं और यह माफी समाचार पत्रों में प्रकाशित की जाएगी।
शिकायतकर्ता की ओर से वकील शैलेश धनंजय चव्हाण, रणजीत पाटिल, सुजीत निकम, और धवलसिंह पाटिल ने पक्ष रखा। इसके बाद हाईकोर्ट ने आरोपियों को 15 दिनों के भीतर राष्ट्रीय स्तर के अखबारों में माफी प्रकाशित करने का आदेश दिया।
माफी पत्र में कहा गया है कि छत्रपति शिवाजी महाराज करोड़ों लोगों के दिलों में सम्मान की जगह रखते हैं और पुस्तक से यदि किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची हो तो इसके लिए गहरा खेद है। साथ ही उदयनराजे भोसले से बिना शर्त क्षमा मांगी गई है।
गौरतलब है कि इस किताब को लेकर विवाद 2004 में तब बढ़ा जब संभाजी ब्रिगेड के कार्यकर्ताओं ने पुणेभंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में तोड़फोड़ की थी। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि संस्थान ने लेखक को शोध में सहयोग दिया था और किताब में शिवाजी महाराज को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गई थीं।