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जम्मू-कश्मीर की महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से बना रहीं हैं आत्मनिर्भरता की नई कहानी

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जम्मू-कश्मीर की महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से बना रहीं हैं आत्मनिर्भरता की नई कहानी

सारांश

जम्मू-कश्मीर की महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के जरिए आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से बढ़ रही हैं। यह पहल उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बना रही है और उनके पारंपरिक हस्तशिल्प को भी पुनर्जीवित कर रही है।

मुख्य बातें

जम्मू-कश्मीर की महिलाएं आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से बढ़ रही हैं।
स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से वे अपनी आजीविका कमा रही हैं।
स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए वोकल फॉर लोकल अभियान महत्वपूर्ण है।
महिलाएं पारंपरिक हस्तशिल्प को जीवित रख रही हैं।
सांबा सखी पहल के जरिए महिलाएं अपनी सांस्कृतिक धरोहर को भी सहेज रही हैं।

जम्मू, 12 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। जम्मू-कश्मीर की महिलाएं अब आत्मनिर्भरता के नए युग की ओर बढ़ रही हैं। स्वयं सहायता समूहों और छोटे व्यवसायों के माध्यम से वे न केवल अपनी आजीविका कमा रही हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी सशक्त हो रही हैं। वर्तमान में लगभग 1,500 महिलाएं विभिन्न गतिविधियों में संलग्न होकर स्वरोजगार के माध्यम से अपना भविष्य संवार रही हैं।

ये महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के जरिए कई प्रकार के कार्य कर रही हैं। इनमें गोबर के उपले बनाना, देवी-देवताओं के लिए वस्त्र तैयार करना, हैंडबैग बनाना और अन्य हस्तनिर्मित उत्पाद शामिल हैं। इन कार्यों से उन्हें नियमित आय प्राप्त हो रही है और वे धीरे-धीरे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।

सांबा जिले में पारंपरिक कला को पुनर्जीवित करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। 'सांबा सखी' नामक पहल के तहत महिलाएं कालिका पेंटिंग पर आधारित व्यवसाय स्थापित कर चुकी हैं, जो इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करता है।

इस पहल का नेतृत्व कर रही उद्यमी मीनाक्षी गुप्ता बताती हैं कि नई पीढ़ी की कई युवतियां भी अब स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से इस कार्य से जुड़ रही हैं। उन्होंने कहा कि इस पहल के लिए उन्हें राज्य स्तर पर पुरस्कार भी मिल चुका है और उनके परिवार ने हमेशा उनका समर्थन किया है।

इन स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं कहती हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए 'वोकल फॉर लोकल' अभियान से उन्हें काफी प्रेरणा मिली है। इस अभियान ने स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और उन्हें बाजार में पहुँचाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया है।

इन उत्पादों को खरीदने वाले ग्राहक भी इस पहल की सराहना करते हैं। उनका कहना है कि ऐसे प्रयासों से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलता है और साथ ही स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को भी संरक्षित करने में मदद मिलती है।

स्वयं सहायता समूहों की सदस्य महिलाएं कहती हैं कि उनके द्वारा बनाए जाने वाले पारंपरिक हस्तशिल्प लंबे समय से जम्मू-कश्मीर की संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। अब इन उत्पादों की मांग केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र के बाहर भी इनके लिए बाजार बन रहा है।

आज लगभग 1,500 महिलाएं इन स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हुई हैं। उनका कहना है कि उन्हें अपने कार्य पर गर्व है और वे चाहती हैं कि और अधिक महिलाएं इस पहल से जुड़े, ताकि मिलकर स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा दिया जा सके और भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया जा सके।

स्वयं सहायता समूहों और पारंपरिक हस्तशिल्प के माध्यम से जम्मू-कश्मीर की महिलाएं न केवल अपने लिए रोजगार के अवसर सृजित कर रही हैं, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रख रही हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह उनके समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर को भी सहेजने में महत्वपूर्ण है। यह पहल निश्चित रूप से एक प्रेरणा स्रोत है, जिसमें महिलाएं आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं।
RashtraPress
15 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्वयं सहायता समूह क्या हैं?
स्वयं सहायता समूह वे संगठन हैं जिनमें महिलाएं मिलकर अपने आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए कार्य करती हैं।
जम्मू-कश्मीर में कितनी महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं?
वर्तमान में लगभग 1,500 महिलाएं विभिन्न स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हुई हैं।
इन समूहों से महिलाओं को क्या लाभ होता है?
इन समूहों से महिलाओं को नियमित आय, आत्मनिर्भरता और पारंपरिक कला को जीवित रखने का अवसर मिलता है।
सांबा सखी पहल क्या है?
सांबा सखी एक पहल है जिसके अंतर्गत महिलाएं कालिका पेंटिंग पर आधारित व्यवसाय शुरू कर रही हैं।
वोकल फॉर लोकल अभियान का क्या प्रभाव है?
इस अभियान ने महिलाओं को स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और उन्हें बाजार में पहुँचाने के लिए प्रेरित किया है।
राष्ट्र प्रेस
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