UP आयुष कॉलेजों में सोवा रिग्पा और सिद्ध पद्धति की पढ़ाई, वाराणसी बनेगा प्रमुख केंद्र
सारांश
Key Takeaways
उत्तर प्रदेश के आयुष कॉलेजों में जल्द ही 2,500 वर्ष पुरानी पारंपरिक हिमालयी चिकित्सा प्रणाली 'सोवा रिग्पा' (अमची चिकित्सा) और सिद्ध पद्धति के डिग्री कोर्स शुरू होने जा रहे हैं। प्रमुख सचिव आयुष रंजन कुमार के अनुसार, योगी सरकार ने इस पहल को हरी झंडी दे दी है और पाठ्यक्रम, मानक तथा इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से विकसित किए जा रहे हैं। इस कदम से लखनऊ स्थित प्रदेश सरकार का लक्ष्य आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी के साथ-साथ सोवा रिग्पा को भी मुख्यधारा में लाना है।
योजना का मुख्य घटनाक्रम
प्रमुख सचिव रंजन कुमार ने बताया कि इन कोर्सों के लिए आवश्यक मानकों और पाठ्यक्रम को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कोर्स शुरू होते ही डिग्रीधारक चिकित्सकों का अधिकृत पंजीकरण भी किया जाएगा, जिससे वे अपने उपचार केंद्र खोल सकेंगे। प्रदेश के चयनित आयुष कॉलेजों में इन पद्धतियों की पढ़ाई जल्द शुरू होने की उम्मीद है।
वाराणसी बनेगा सोवा रिग्पा का राष्ट्रीय हब
वाराणसी में सोवा रिग्पा का एक प्रमुख केंद्र विकसित किया जाएगा, जो शोध, प्रशिक्षण और उपचार का केंद्रबिंदु होगा। इस शहर को इस परियोजना के लिए इसलिए चुना गया है क्योंकि यह पहले से ही आयुर्वेद और आध्यात्मिक चिकित्सा का प्रतिष्ठित केंद्र रहा है। यहाँ जटिल बीमारियों के उपचार पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
सोवा रिग्पा और सिद्ध पद्धति क्या हैं
सोवा रिग्पा हिमालयी क्षेत्रों में प्रचलित एक प्राचीन चिकित्सा पद्धति है, जिसकी उत्पत्ति तिब्बत में मानी जाती है। यह प्रणाली शरीर, मन और पर्यावरण के संतुलन पर आधारित है और जड़ी-बूटियों, खनिजों तथा प्राकृतिक तत्वों के माध्यम से रोगों का उपचार करती है। यह विशेष रूप से गठिया, पाचन विकार, मानसिक तनाव, त्वचा रोग और कैंसर जैसी बीमारियों में उपयोगी मानी जाती है।
सिद्ध चिकित्सा प्रणाली मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है और यह शरीर के तीन दोषों — वात, पित्त और कफ — के संतुलन पर आधारित है। इसमें औषधियों के साथ-साथ जीवनशैली और आहार पर विशेष जोर दिया जाता है।
आम जनता और युवाओं पर असर
इन कोर्सों की शुरुआत से कैंसर, जोड़ों के दर्द, मानसिक रोग और दीर्घकालिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को वैकल्पिक उपचार के नए विकल्प मिलेंगे। प्रशिक्षित चिकित्सक ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचा सकेंगे, जहाँ आधुनिक चिकित्सा की पहुँच अभी भी सीमित है। इसके अलावा, युवाओं के लिए रोज़गार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
शोध और वैज्ञानिक आधार को मिलेगा बल
गौरतलब है कि इन पद्धतियों पर अब तक व्यवस्थित वैज्ञानिक शोध सीमित रहा है। नई पहल के तहत इन पद्धतियों के वैज्ञानिक आधार को मज़बूत करने के लिए शोध को भी प्रोत्साहन दिया जाएगा। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार भी राष्ट्रीय स्तर पर आयुष क्षेत्र को विस्तार देने की दिशा में सक्रिय है। आने वाले महीनों में पाठ्यक्रम को अंतिम रूप मिलने के बाद दाखिले की प्रक्रिया स्पष्ट होने की संभावना है।