क्या झारखंड की मेगालिथिक विरासत को वैश्विक पटल पर लाने का प्रयास सफल होगा?

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क्या झारखंड की मेगालिथिक विरासत को वैश्विक पटल पर लाने का प्रयास सफल होगा?

सारांश

क्या झारखंड की मेगालिथिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का यह प्रयास सफल होगा? जानिए कैसे राज्य सरकार ने इस दिशा में कदम उठाए हैं।

Key Takeaways

  • झारखंड की मेगालिथिक विरासत का संरक्षण एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • यूके में विशेषज्ञों के साथ बैठकें हुईं।
  • स्थानीय समुदायों की भागीदारी आवश्यक है।
  • संरक्षण के लिए वैज्ञानिक उपाय अपनाए जाएंगे।
  • यह विरासत हमारी संस्कृति का हिस्सा है।

रांची, 21 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। झारखंड की प्राचीन मेगालिथिक अर्थात् महापाषाण विरासत को संरक्षित करने और इसे वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने हेतु राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इस संदर्भ में, मंत्री सुदिव्य कुमार के नेतृत्व में झारखंड सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल यूनाइटेड किंगडम के दौरे पर है। यहाँ प्रतिनिधिमंडल ने कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और विशेषज्ञों के साथ महत्वपूर्ण बैठकें कीं।

इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य झारखंड में विद्यमान प्राचीन पत्थर संरचनाओं का संरक्षण, मरम्मत और बेहतर प्रबंधन करना रहा। यूके दौरे के दौरान, प्रतिनिधिमंडल ने म्यूजियम ऑफ लंदन आर्कियोलॉजी, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन, वॉरडेल आर्मस्ट्रॉन्ग, सिम्पसन एंड ब्राउन, एईकॉम, वेसेक्स आर्कियोलॉजी और अरप जैसी प्रमुख संस्थाओं के विशेषज्ञों के साथ संवाद किया।

सरकार द्वारा बताया गया है कि इन बैठकों में मेगालिथिक स्थलों के वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, उनकी संरचनात्मक मजबूती, आस-पास के क्षेत्र की सुरक्षा और स्थानीय समुदाय की भागीदारी जैसे मुद्दों पर गहराई से चर्चा हुई। इसके अलावा, झारखंड की इन धरोहरों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विकसित कर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की दिशा में ठोस प्रयास करने पर भी जोर दिया गया।

मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि झारखंड की मेगालिथिक विरासत केवल पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह आदिवासी और स्थानीय समुदायों की संस्कृति, परंपरा और पहचान से जुड़ी है। इसलिए इनके संरक्षण के लिए ऐसा दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए जो परंपराओं का सम्मान करे और धरोहर को सुरक्षित रखे।

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी इस दृष्टिकोण का समर्थन किया और समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल को अपनाने की सलाह दी। इन बैठकों में पुरातत्व, विरासत संरक्षण, इंजीनियरिंग और तकनीकी सलाह के क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा की गई। इससे झारखंड में कार्यरत संस्थाओं की क्षमता में वृद्धि करने में भी सहायता मिलेगी।

मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि ये बैठकें झारखंड की प्राचीन धरोहरों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संरक्षित करने की दिशा में एक मजबूत शुरुआत हैं। इससे राज्य की मेगालिथिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने में मदद मिलेगी और आने वाली पीढ़ियाँ भी इससे जुड़ सकेंगी।

उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में राज्य सरकार अपनी सांस्कृतिक धरोहर को लेकर पूरी तरह से गंभीर है। सरकार का मानना है कि यह विरासत केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज की जीवित संस्कृति का हिस्सा है। इसे बचाने के लिए वैज्ञानिक तरीकों के साथ-साथ स्थानीय लोगों की भागीदारी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को साथ लेकर आगे बढ़ा जाएगा।

Point of View

बल्कि यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में स्थान पाने की दिशा में भी एक मजबूत कदम है।
NationPress
21/01/2026

Frequently Asked Questions

झारखंड की मेगालिथिक विरासत क्या है?
यह प्राचीन पत्थर संरचनाएँ हैं जो आदिवासी और स्थानीय समुदायों की संस्कृति से जुड़ी हैं।
सरकार का इस विरासत को संरक्षित करने का क्या उद्देश्य है?
सरकार का उद्देश्य इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार संरक्षित कर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराना है।
इस पहल में कौन-कौन से संस्थान शामिल हैं?
इसमें म्यूजियम ऑफ लंदन आर्कियोलॉजी, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और अन्य प्रमुख संस्थान शामिल हैं।
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