क्या झारखंड में पेसा कानून लागू होने के बाद हाईकोर्ट ने बालू घाटों की नीलामी और आवंटन पर रोक हटाई?
सारांश
Key Takeaways
- पेसा कानून का लागू होना आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण है।
- हाईकोर्ट का आदेश बालू घाटों के आवंटन पर स्पष्टता लाता है।
- राज्य सरकार को पेसा नियमावली के अनुपालन में तेजी लानी होगी।
रांची, १३ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में पेसा (पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरिया एक्ट) नियमावली लागू होने के बाद मंगलवार को इससे संबंधित अवमानना याचिका का निपटारा कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने बालू घाटों की नीलामी के बाद उनके अलॉटमेंट पर लगाई गई रोक को भी समाप्त कर दिया है।
यह अवमानना याचिका आदिवासी बुद्धिजीवी मंच द्वारा दायर की गई थी, जिस पर मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ में सुनवाई हुई। राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पेसा नियमावली को अधिसूचित कर लागू कर दिया गया है। प्रार्थियों की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार ने पक्ष रखा। अदालत ने सरकार के अनुपालन को स्वीकार करते हुए पहले जारी अंतरिम आदेश को वापस ले लिया।
ज्ञात हो कि इससे पहले २३ दिसंबर को हुई सुनवाई में झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब तक पेसा नियमावली को अंतिम रूप देकर लागू नहीं किया जाता, तब तक राज्य में बालू घाटों और अन्य लघु खनिजों की नीलामी और आवंटन पर लगी रोक बरकरार रहेगी। उस दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया था कि पेसा नियमावली का मसौदा कैबिनेट में रखा जाएगा और प्रक्रिया अंतिम चरण में है, जिसके बाद अगली सुनवाई १३ जनवरी २०२६ को निर्धारित की गई थी। इससे पूर्व ९ सितंबर को अदालत ने पेसा नियमावली लागू होने तक राज्य में बालू घाटों सहित सभी लघु खनिजों की नीलामी पर रोक लगा दी थी।
अदालत ने कहा था कि पेसा नियमावली लागू न होना ७३वें संविधान संशोधन की भावना के विपरीत है और इससे अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
बता दें कि केंद्र सरकार ने वर्ष १९९६ में पेसा अधिनियम लागू किया था। झारखंड में वर्ष २०१९ और २०२३ में इसकी नियमावली का ड्राफ्ट तैयार किया गया, लेकिन लंबे समय तक इसे लागू नहीं किया जा सका। इसी देरी के खिलाफ आदिवासी बुद्धिजीवी मंच ने पहले जनहित याचिका और बाद में अवमानना याचिका दायर की थी, जिस पर अब हाईकोर्ट के ताजा आदेश के साथ विराम लग गया है।