क्या उपराष्ट्रपति ने जेएनयू में राष्ट्र-निर्माण में योगदान का आह्वान किया?
सारांश
Key Takeaways
- लोकतांत्रिक परंपरा का महत्व
- सामूहिक सहयोग की आवश्यकता
- शिक्षा का असली उद्देश्य
- राष्ट्रीय विकास में योगदान
- भारतीय भाषाओं का संवर्धन
नई दिल्ली, 12 जनवरी (राष्ट्र प्रेस) उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने सोमवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का दौरा किया। इस अवसर पर उन्होंने जेएनयू की लोकतांत्रिक परंपरा का उल्लेख किया और कहा कि वाद-विवाद, चर्चा, असहमति और यहां तक कि टकराव भी एक स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक तत्व हैं।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इन प्रक्रियाओं का अंततः किसी निष्कर्ष तक पहुंचना आवश्यक है। एक बार निर्णय हो जाने के बाद, उसके प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सामूहिक सहयोग अनिवार्य है, जिससे प्रशासन सुचारु और प्रभावी ढंग से संचालित हो सके। उपराष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक मूल्यों का समानांतर विकास आवश्यक है।
उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने जेएनयू के 9वें दीक्षांत समारोह में भाग लिया और छात्रों से संबोधित करते हुए कहा कि उपनिषदों से लेकर भगवद्गीता, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और तिरुक्कुरल तक, भारतीय शास्त्रों ने सदैव समाज और नैतिक जीवन में शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उन्होंने स्नातक विद्यार्थियों को बधाई देते हुए उनसे अपने ज्ञान और कौशल को राष्ट्र सेवा में समर्पित करने का आह्वान किया। स्वामी विवेकानंद की जयंती का स्मरण करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा केवल डिग्रियां प्राप्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य चरित्र निर्माण, बौद्धिक सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना होना चाहिए।
उन्होंने रेखांकित किया कि शिक्षा और समुचित प्रशिक्षण के माध्यम से ही भारत का युवा वर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 के विजन को साकार कर सकता है। भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षण केंद्रों का संदर्भ दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्ची शिक्षा आचरण और चरित्र का निर्माण करती है, न कि केवल उपाधियों का संचय। उपराष्ट्रपति ने जेएनयू के समावेशी वातावरण की सराहना की और छात्र प्रवेश एवं संकाय नियुक्तियों में समानता और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने के विश्वविद्यालय के प्रयासों की प्रशंसा की।
उन्होंने विश्वविद्यालय नेतृत्व द्वारा उभरते और सभ्यतागत विषयों में हिंदू, जैन और बौद्ध अध्ययन के नए केंद्रों की स्थापना की भी प्रशंसा की। भारतीय भाषाओं के संवर्धन हेतु जेएनयू की पहल का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने विशेष रूप से तमिल अध्ययन के केंद्र तथा असमिया, उड़िया, मराठी और कन्नड़ में स्थापित चेयर्स और कार्यक्रमों की सराहना की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावना के अनुरूप ज्ञान-सृजन को मातृभाषाओं में फलना-फूलना चाहिए।
अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने जेएनयू के छात्रों से तीन मूल दायित्वों को अपनाने का आग्रह किया, जिनमें सत्य की खोज में बौद्धिक ईमानदारी, असमानताओं को कम करने हेतु सामाजिक समावेशन और राष्ट्रीय विकास में सक्रिय योगदान शामिल हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से संविधानिक मूल्यों और भारत की सभ्यतागत विरासत से मार्गदर्शन लेने, तथा अपने माता-पिता और शिक्षकों का सदैव सम्मान करने का आह्वान किया। विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उपराष्ट्रपति ने भारत की एकता और सामूहिक प्रगति के संकल्प को दोहराया।
इस अवसर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, जेएनयू के चांसलर कंवल सिब्बल, कुलपति प्रो. संतिश्री धुलीपुड़ी पंडित, वरिष्ठ अधिकारी, संकाय सदस्य, स्नातक विद्यार्थी एवं उनके परिजन उपस्थित रहे। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा कि जेएनयू की अपनी एक समृद्ध विरासत है। अंतर-विषयक रिसर्च पर फोकस करना जेएनयू के डीएनए का हिस्सा है। जेएनयू अपने समय से काफी आगे सोचने वाला एक प्रयोगशाला रहा है।
शिक्षा मंत्री ने कहा कि जेएनयू का एकेडमिक वातावरण लीडरशिप विकसित करने का एक सशक्त केंद्र रहा है। उन्होंने कहा कि डॉ. डी. पी. त्रिपाठी, कॉमरेड सीताराम येचुरी, कॉमरेड प्रकाश करात, निर्मला सीतारमण और डॉ. एस. जयशंकर जैसे जेएनयू के प्रतिष्ठित पूर्व छात्रों ने सार्वजनिक जीवन में विशिष्ट पहचान स्थापित की है। शिक्षा मंत्री ने कहा कि आलोचनात्मक चिंतन जेएनयू की आत्मा है।
जेएनयू में बहस, चर्चा, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों और बौद्धिक आदान-प्रदान की एक सजीव परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि जेएनयू एक ऐसा बौद्धिक केंद्र रहा है, जहां विचारों को परखा, संवारा और विकसित किया जाता है, और यही विचार आगे चलकर राष्ट्रीय नीतियों और सार्वजनिक विमर्श को दिशा प्रदान करते हैं।