ज्योति बसु के कम्युनिस्ट मॉडल के तहत पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण कैसे हुआ?
सारांश
Key Takeaways
- ज्योति बसु का शासन बंगाली संस्कृति का संरक्षण करने में महत्वपूर्ण था।
- वाम मोर्चे ने दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों को बढ़ावा दिया।
- 'नंदन' जैसी सांस्कृतिक परियोजनाएँ स्थापित की गई।
- राजनीतिक और सामाजिक सुधारों का दौर था।
- 'ऑपरेशन बर्गा' ने कृषि उत्पादन में वृद्धि की।
कोलकाता, 11 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। जब भी दुनियाभर में कम्युनिस्ट शासन की चर्चा होती है, तो अक्सर 'सांस्कृतिक क्रांतियों' का उल्लेख होता है, जहां पुरानी परंपराओं को समाप्त करके एक नया ढांचा स्थापित करने का प्रयास किया गया (जैसे कि चीन या सोवियत संघ में)। लेकिन 1977 में, जब ज्योति बसु के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे ने शासन संभाला, तो इतिहास ने एक नई दिशा ली।
पश्चिम बंगाल में वामपंथ कभी भी वहां की सांस्कृतिक जड़ों से टकराया नहीं। ज्योति बसु के शासनकाल में भले ही कारखानों पर लाल झंडे फहराए गए हों, लेकिन पश्चिम बंगाल की हवाओं में रवींद्रनाथ टैगोर के संगीत की मिठास और सत्यजीत रे के सिनेमा का जादू कभी कम नहीं हुआ।
भारतीय राजनीति के इतिहास में जब भी सबसे लंबे समय तक और प्रभावशाली तरीके से शासन करने वाले मुख्यमंत्रियों का नाम लिया जाता है, तो ज्योति बसु का नाम शीर्ष तीन में आता है। 1977 में जब उन्होंने पश्चिम बंगाल की सत्ता संभाली, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह राज्य तीन दशकों से अधिक समय तक 'लाल दुर्ग' बना रहेगा। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक वैचारिक और सामाजिक बदलाव की शुरुआत थी।
ज्योति बसु ने 21 जून 1977 को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और वे 6 नवंबर 2000 तक इस पद पर बने रहे। उनका कुल कार्यकाल 23 वर्ष और 137 दिनों का रहा। सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से पहले, वे भारतीय इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री रहे। स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने स्वेच्छा से पद छोड़ा और बुद्धदेब भट्टाचार्य को सत्ता सौंपी।
पश्चिम बंगाल में वामपंथ की सफलता का एक बड़ा कारण यह था कि इसके नेता स्वयं बंगाली 'भद्रलोक' (संभ्रांत और शिक्षित वर्ग) का हिस्सा थे। ज्योति बसु खुद लंदन से पढ़े हुए बैरिस्टर थे। उनकी और उनकी कैबिनेट (जिसमें बुद्धदेब भट्टाचार्य जैसे संस्कृति-प्रेमी शामिल थे) की वैचारिक जड़ें भले ही मार्क्सवाद में थीं, लेकिन उनकी आत्मा पूरी तरह से बंगाली थी।
ज्योति बसु का कार्यकाल बंगाली सिनेमा और कला का संरक्षण करने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। इसका सबसे अच्छा उदाहरण 'नंदन' है। ज्योति बसु सरकार ने कोलकाता में फिल्म और सांस्कृतिक केंद्र 'नंदन' की स्थापना की। इसका उद्घाटन स्वयं महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने किया था और इसका लोगो भी उन्होंने डिजाइन किया था।
यह वह समय था जब मृणाल सेन, ऋत्विक घटक और सत्यजीत रे जैसे फिल्मकारों को सरकार का मौन या सक्रिय समर्थन प्राप्त था। नंदन केवल एक सिनेमाघर नहीं था, बल्कि यह दुनिया के बेहतरीन सिनेमा और कला विमर्श का एक अंतर्राष्ट्रीय केंद्र बन गया।
वामपंथी आंदोलन की जड़ें 'इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन' (आईपीटीए) से गहराई से जुड़ी हुई थीं। इसलिए ज्योति बसु के कार्यकाल में राजनीतिक और सामाजिक रंगमंच को बहुत बढ़ावा मिला। उत्पल दत्त, शंभू मित्रा और बाद में 'नंदीकर' व 'बहुरूपी' जैसे थिएटर ग्रुप्स ने कला को आम जनता तक पहुंचाया।
कॉलेज स्ट्रीट का 'इंडियन कॉफी हाउस' इस समय में लेखकों, कवियों (जैसे सुनील गंगोपाध्याय और शंख घोष) और बुद्धिजीवियों के स्वतंत्र विमर्श का सबसे बड़ा केंद्र बना रहा। यहां सरकार की नीतियों की आलोचना भी होती थी और वामपंथ का समर्थन भी।
कम्युनिज्म को सैद्धांतिक रूप से धर्म का विरोधी माना जाता है, लेकिन ज्योति बसु के बंगाल में दुर्गा पूजा कभी बंद या सीमित नहीं हुई, बल्कि यह एक विशाल सामाजिक-सांस्कृतिक कार्निवाल में बदल गई।
पंडालों के बाहर किताबों के स्टॉल एक अनूठा दृश्य प्रस्तुत करते थे। भव्य दुर्गा पूजा पंडालों के ठीक बाहर वामपंथी कैडर मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के साहित्य के स्टॉल लगाते थे।
देवी की आराधना और वामपंथी साहित्य का यह सह-अस्तित्व इस बात का प्रमाण था कि बसु की सरकार ने बंगाली संस्कृति के इस सबसे बड़े त्योहार को अपनी राजनीति के साथ बहुत ही सहजता से जोड़ लिया था।
पश्चिम बंगाल में वामपंथ के उदय और कांग्रेस के पतन की कहानी रातों-रात नहीं लिखी गई। इसके पीछे 1970 के दशक की गहरी राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल थी।
1972 से 1977 तक बंगाल में सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। यह वह दौर था जब नक्सलबाड़ी आंदोलन अपने चरम पर था। कांग्रेस सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस बल का भारी और अक्सर क्रूर उपयोग किया, जिससे युवाओं और आम जनता में भयंकर आक्रोश उत्पन्न हुआ।
1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद लाखों शरणार्थियों का बोझ बंगाल पर पड़ा। केंद्र की तत्कालीन नीतियों से बंगाली भद्रलोक और मध्यम वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। इन सभी कारकों (बेरोजगारी, पुलिस दमन, और आपातकाल के खिलाफ गुस्सा) को ज्योति बसु और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने एक जन-आंदोलन में बदल दिया। 1977 के विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चे ने प्रचंड बहुमत हासिल किया और बंगाल की सत्ता कांग्रेस के हाथों से निकल गई।
'ऑपरेशन बर्गा' बसु सरकार की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी उपलब्धि थी। 'ऑपरेशन बर्गा' के तहत राज्य सरकार ने भूमिहीन किसानों और बंटाईदारों को कानूनी मान्यता दी। उन्हें जमींदारों की मनमानी बेदखली से सुरक्षा मिली। फसल में उनका हिस्सा सुनिश्चित किया गया। इस एक कदम ने कृषि उत्पादन में भारी वृद्धि की और ग्रामीण बंगाल के करोड़ों गरीब किसानों को वाम मोर्चे का स्थायी मतदाता बना दिया।
पश्चिम बंगाल भारत के उन प्रारंभिक राज्यों में से एक था जिसने त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को पूरी ताकत से लागू किया। ज्योति बसु ने सत्ता का विकेंद्रीकरण किया और गांवों के विकास के लिए धन सीधे पंचायतों को सौंपा। इससे ग्रामीण स्तर पर वामपंथी कैडर का एक मजबूत ढांचा तैयार हुआ।