क्या मायावती ने कांशीराम के बहुजन मिशन को भाजपा के हाथों बेच दिया?

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क्या मायावती ने कांशीराम के बहुजन मिशन को भाजपा के हाथों बेच दिया?

सारांश

कांशीराम की पुण्यतिथि पर सियासी बयानबाजी में कांग्रेस और सपा ने मायावती पर भाजपा के प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया। सुरेंद्र राजपूत ने कहा कि मायावती को संविधान विरोधी ताकतों का विरोध करना चाहिए। पढ़ें पूरी खबर।

मुख्य बातें

कांशीराम ने बहुजन मिशन की नींव रखी।
मायावती पर भाजपा के प्रति नरम रुख का आरोप।
संविधान विरोधी ताकतों के खिलाफ बोलने की जरूरत।
उत्तर प्रदेश में दलितों का उत्पीड़न बढ़ रहा है।
बिहार में एसआईआर का मुद्दा गंभीर है।

लखनऊ, 9 अक्टूबर (राष्ट्र प्रेस)। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर राजनीतिक चर्चाएं तीव्र हो गईं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) ने बसपा प्रमुख मायावती पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाने का आरोप लगाया।

कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने कांशीराम को श्रद्धांजलि देते हुए कहा, "कांशीराम की पुण्यतिथि पर हम उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। वह करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने बहुजन मिशन की नींव रखी, लेकिन मायावती ने इसे भाजपा के हाथों बेच दिया।"

उन्होंने मायावती पर संविधान विरोधी ताकतों के खिलाफ बोलने का आरोप लगाते हुए कहा कि यदि वह आरक्षण और संविधान के खिलाफ बोलने वालों का विरोध करेंगी, तभी उनका सम्मान बढ़ेगा।

कांग्रेस प्रवक्ता ने केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि केंद्र ने टैरिफ को लेकर अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण किया और पहले चीन के सामने भी ऐसा ही रवैया अपनाया। हमें उम्मीद है कि ब्रिटेन के सामने भारत ऐसा नहीं करेगा।

इस बीच, भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह की पत्नी ज्योति के चुनाव लड़ने के मुद्दे पर सुरेंद्र राजपूत ने तंज कसा। उन्होंने कहा, "पवन सिंह की संगति खराब है। भाजपा में शामिल होने वाले लोग अपने परिवार की उपेक्षा करते हैं और पत्नियों को छोड़ देते हैं। पवन सिंह ने भाजपा में आते ही अपने परिवार को बर्बाद कर दिया।"

सपा प्रवक्ता अमीक जामेई ने भी मायावती की चुप्पी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश से दुर्व्यवहार पर भी मायावती ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जबकि भाजपा और उससे जुड़ी ताकतों ने इस घटना का जश्न मनाया।

जामेई ने कहा, "उत्तर प्रदेश में भाजपा शासन में दलितों का भयंकर उत्पीड़न हो रहा है, लेकिन मायावती चुप हैं। हमें उम्मीद थी कि वह इस मुद्दे पर बोलेंगी।"

उन्होंने कहा कि बिहार में सबसे बड़ी समस्या एसआईआर का मुद्दा है, जहां लगभग 60 लाख दलितों, अति पिछड़ों, मजदूरों और गरीब किसानों के नाम काटे गए हैं। यही समस्या उत्तर प्रदेश में भी आएगी और सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले समुदाय दलित, मेहनतकश मजदूर होंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह स्पष्ट है कि राजनीतिक बयानबाजी में सच्चाई से ज्यादा चुनावी लाभ की चाह होती है। मायावती के मौन रहना कई सवाल उठाता है, लेकिन हमें समझना होगा कि हर राजनीतिक कदम के पीछे एक रणनीति होती है।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कांशीराम की पुण्यतिथि क्यों महत्वपूर्ण है?
कांशीराम ने बहुजन समाज के लिए एक मजबूत आंदोलन खड़ा किया, और उनकी पुण्यतिथि पर उनके योगदान को याद किया जाता है।
मायावती के भाजपा के प्रति रुख का क्या अर्थ है?
मायावती का नरम रुख भाजपा को समर्थन देने के संकेत के रूप में देखा जा सकता है, जो उनकी राजनीतिक रणनीति का भाग है।
राष्ट्र प्रेस
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