कन्याकुमारी का नागराज मंदिर: जादुई रेत और काल सर्प दोष से मुक्ति
सारांश
Key Takeaways
- नागराज मंदिर कन्याकुमारी में स्थित है।
- यहां भक्तों को प्रसाद के रूप में जादुई रेत मिलती है।
- मंदिर की छत घास और भूसे से बनी है।
- नागपंचमी पर विशेष पूजा होती है।
- भक्त यहां काल सर्प दोष से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।
नई दिल्ली, 11 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत के हर कोने में 33 करोड़ देवी-देवताओं के निवास और चमत्कारों से भरे मंदिरों की भरमार है। उत्तर से दक्षिण तक, जहां भगवान भोलेनाथ के अनगिनत मंदिर और ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं, वहीं नागराज के मंदिर भी दिखते हैं। यहां भक्त काल सर्प दोष से मुक्ति पाने की इच्छा लेकर आते हैं। हम यहां कन्याकुमारी के एक विशेष मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां भक्तों को प्रसाद के रूप में जादुई रेत प्राप्त होती है।
तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के नागरकोइल शहर में स्थित नागराज का मंदिर नागराज वासुकी को समर्पित है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यह अत्यंत समृद्ध है, फिर भी इसके गर्भगृह की छत घास, भूसे और ताड़ के पत्तों से बनी है। ऐसा माना जाता है कि जब भी इस छत को स्थायी बनाने या सोने से ढकने का प्रयास किया गया, तो सर्प देवता स्वप्न में प्रकट होकर इसे रोक देते थे या फिर कार्य में कोई बाधा उत्पन्न हो जाती थी।
स्थानीय लोगों का मानना है कि नागदेवता को प्रकृति और सादगी पसंद है, और यही कारण है कि उन्हें घास, भूसे और ताड़ से बनी छत प्रिय है। मंदिर का गर्भगृह भी अन्य मंदिरों से भिन्न है। यहां नागराज वासुकी की प्रतिमा के पास रेत रखा होता है, जो भक्तों को ठंडक प्रदान करता है। दर्शन करने आने वाले भक्तों को भी प्रसाद में रेत प्राप्त होता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रेत को शरीर पर मलने से त्वचा रोगों में राहत मिलती है। मंदिर की वास्तुकला अद्वितीय और सादगी से भरी है, क्योंकि इसका मुख्य प्रवेश द्वार, जिसे महामेरु मलिगई कहा जाता है, एक बौद्ध विहार की तरह दिखता है। यह मंदिर पूर्व दिशा की ओर है, लेकिन श्रद्धालु दक्षिण दिशा से प्रवेश करते हैं। यहां के मुख्य देवता नागराज, पांच सिर वाले सर्प हैं। मंदिर में भगवान अनंतकृष्णन, शिव, मुरुगन और दुर्गा की मूर्तियां भी हैं, लेकिन मुख्य गर्भगृह मिट्टी का बना एक घर है, जिसकी छत घास-फूस की है।
हर साल तमिल माह आषाढ़ के दौरान इस घास-फूस की छत को बदला जाता है। मान्यता है कि जब भी गर्भगृह की छत को बदला जाता है, तो मंदिर के पुजारी को हमेशा एक सांप दर्शन जरूर देता है। इसके अलावा, एक अलग गर्भगृह भी है जहां सैकड़ों सांपों की मूर्तियां स्थापित हैं, जिन्हें मंदिर और उसके आस-पास के क्षेत्र की रक्षा करने वाला माना जाता है।
नागपंचमी और आयुल्या पूजा के उत्सव पर मंदिर में अपार भीड़ होती है। नागपंचमी के अवसर पर मुख्य देवता नागराज को दूध अर्पित किया जाता है और घर की सुख-शांति की प्रार्थना की जाती है। नागराज की पूजा के साथ-साथ, मंदिर में भगवान शिव की प्रतिमा की भी पूजा की जाती है, जो भगवान शिव से ही नागदेवता के अस्तित्व को मानती है।