क्या काजी नजरुल इस्लाम एक विद्रोही कवि थे?

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क्या काजी नजरुल इस्लाम एक विद्रोही कवि थे?

सारांश

काजी नजरुल इस्लाम का जीवन और लेखन एक अद्वितीय कहानी है, जो उपनिवेशवाद और सामाजिक अन्याय के खिलाफ विद्रोह की आवाज बन गई। उनकी कविताएं आज भी प्रेरणा देती हैं, और वे केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक क्रांति के प्रतीक हैं।

Key Takeaways

  • काजी नजरुल इस्लाम का जीवन संघर्ष और विद्रोह की कहानी है।
  • उनकी कविताएं आज भी अन्याय के खिलाफ एक प्रेरणा स्रोत हैं।
  • उन्होंने बांग्ला गजलों की नई धारा प्रारंभ की।
  • उनके साहित्य ने स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया।
  • वे एक दूरदर्शी चिंतक भी थे।

नई दिल्ली, 28 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। लगभग 5 दशक पहले, 29 अगस्त 1976 को दुनिया ने काजी नजरुल इस्लाम को हमेशा के लिए खामोश होते देखा, जिन्होंने उपनिवेशवाद, असमानता और कट्टरता के खिलाफ कविता को एक शक्ति बना दिया था। उन्हें 'विद्रोही कवि' कहा जाता है, जो केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि एक क्रांति का प्रतीक थे। उनकी कविताएं और गीत बंगाल से निकलकर सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में आजादी और न्याय का संदेश फैलाने में सहायक बने। बांग्लादेश ने उन्हें आधिकारिक रूप से अपना राष्ट्रीय कवि स्वीकार किया, किन्तु उनका प्रभाव भारत की मिट्टी और आत्मा में भी गहराई से मौजूद है।

काजी नजरुल इस्लाम का जन्म 25 मई 1899 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसीडेंसी के आसनसोल उपखंड (अब पश्चिम बंगाल) के चुरुलिया गांव में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ। बचपन की कठिनाइयों ने उन्हें 'दुखु मियां' (दुखों का बेटा) नाम से जाना। यही अभाव उनके साहित्यिक दृष्टिकोण और विद्रोही चेतना का आधार बना। पहले वे मस्जिद में मुअज्जिन की आवाज देते थे और उसके बाद चाय की दुकानों पर काम करते हुए थियेटर समूहों से जुड़े और साहित्य, कविता व नाटकों की दुनिया में कदम रखा।

18 वर्ष की आयु में उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल होकर 49वीं बंगाल रेजिमेंट में तीन वर्ष बिताए। इस दौरान भी उन्होंने अपनी लेखनी को सक्रिय रखा– उनकी पहली गद्य रचना 'बाउंदुलेर आत्मकहिनी' और पहली कविता 'मुक्ति' इसी समय प्रकाशित हुई। सेना से लौटने के बाद उन्होंने पत्रकारिता में अपनी क्रांति का माध्यम बनाया। 1920 में उन्होंने नवयुग और बाद में धूमकेतु पत्रिका का प्रकाशन किया, जिनमें उनकी लेखनी ने ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया। अगस्त 1922 में प्रकाशित कविता 'आनंदमयी आगमने' पर उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। जेल में रहते हुए उन्होंने 'राजबंदी की जुबानबंदी' लिखी और 40 दिन की भूख हड़ताल की।

उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता 'विद्रोही' ने उन्हें 'विद्रोही कवि' की उपाधि दिलाई। यह उपाधि केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि उनके जीवन के दर्शन का सारांश थी। वे न केवल उपनिवेशवाद बल्कि धार्मिक कट्टरता, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक अन्याय के भी प्रबल विरोधी रहे। उन्होंने बांग्ला गजलों की एक नई धारा प्रारंभ की और प्रेम, स्वतंत्रता और क्रांति को एक साथ पिरोया।

हालांकि, 1942 में मात्र 43 वर्ष की आयु में एक रहस्यमय बीमारी ने उनकी आवाज और स्मृति छीन ली। कई इतिहासकार मानते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें धीरे-धीरे जहर दिया था। इसके बाद नजरुल लंबे समय तक एकांत और बीमारी से जूझते रहे। 1972 में बांग्लादेश सरकार ने उन्हें और उनके परिवार को ढाका आमंत्रित किया। स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरित देश ने उन्हें नागरिकता दी और राष्ट्रीय कवि घोषित किया। अंततः 29 अगस्त 1976 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

नजरुल के साहित्य और गीतों ने न केवल बंगालियों को आजादी के लिए प्रेरित किया, बल्कि दुनिया को यह संदेश दिया कि कविता केवल कागज पर शब्द नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ एक हथियार बन सकती है। उन्होंने 1920 में ही अपने लेख 'रोज-कियामत' में पर्यावरण संकट की भविष्यवाणी की थी, जो दशकों बाद वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनी। यह स्पष्ट है कि वे केवल विद्रोही कवि नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी चिंतक भी थे।

कहना गलत नहीं होगा कि काजी नजरुल इस्लाम का जीवन और लेखन एक पुल है – गरीबी से विद्रोह, कविता से क्रांति और स्थानीय संघर्ष से वैश्विक चेतना तक। उनकी कविताओं की पंक्तियां आज भी यह बताती हैं कि बगावत कभी मरती नहीं, वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आत्मा में जीवित रहती है।

Point of View

बल्कि सम्पूर्ण भारत में क्रांति का प्रतीक बना। उनकी आवाज, आज भी अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत है।
NationPress
30/08/2025

Frequently Asked Questions

काजी नजरुल इस्लाम का जन्म कब हुआ?
काजी नजरुल इस्लाम का जन्म 25 मई 1899 को हुआ।
काजी नजरुल इस्लाम को किस उपाधि से पुकारा जाता है?
उन्हें 'विद्रोही कवि' के नाम से जाना जाता है।
उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता कौन सी है?
उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता 'विद्रोही' है।
काजी नजरुल इस्लाम ने कब अंतिम सांस ली?
उन्होंने 29 अगस्त 1976 को अंतिम सांस ली।
बांग्लादेश ने उन्हें किस उपाधि से सम्मानित किया?
बांग्लादेश ने उन्हें राष्ट्रीय कवि की उपाधि दी।