क्या केशव चंद्र सेन भारत का वह 'ब्रह्मानंद' थे जिसने सात समंदर पार आध्यात्म की अलख जगाई?
सारांश
Key Takeaways
- केशव चंद्र सेन ने भारतीय समाज में कई महत्वपूर्ण सुधार किए।
- उन्होंने 'भारतीय ब्रह्म समाज' की स्थापना की।
- उनकी वक्तृत्व कला ने इंग्लैंड में भी धूम मचाई।
- उन्होंने विधवा विवाह और अंतरजातीय विवाह का समर्थन किया।
- उनकी मित्रता ने भक्ति के मार्ग को प्रशस्त किया।
नई दिल्ली, 7 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। उन्नीसवीं सदी का वह महत्वपूर्ण समय, जब एक युवा ने न सिर्फ भारत की जड़ता को चुनौती दी, बल्कि सात समंदर पार जाकर अंग्रेजों को भी अपनी वक्तृत्व कला से मंत्रमुग्ध कर दिया। यह कहानी उस 'ब्रह्मानंद' की है, जिसने पूर्व और पश्चिम के मिलन का एक नया 'विधान' रचा।
कलकत्ता के एक समृद्ध 'वैद्य' परिवार में 19 नवंबर 1838 को केशव चंद्र सेन का जन्म हुआ। उनके दादा, रामकमल सेन, सती प्रथा के प्रबल समर्थक थे। वही प्रथा जिसे राजा राम मोहन राय समाप्त करना चाहते थे। लेकिन किस्मत का खेल देखिए, उसी घर में जन्मा बालक बड़ा होकर उन बेड़ियों को तोड़ने वाला सबसे धारदार औजार बना।
महज 10 वर्ष की आयु में पिता को खोने वाले केशव का झुकाव शुरू से ही कुछ अलग था। हिंदू कॉलेज में अध्ययन करते हुए उन्होंने गणित से ज्यादा नैतिकता और पाश्चात्य दर्शन में रुचि ली। किशोरावस्था में उन्होंने पारंपरिक कर्मकांडों को नकार दिया। यह एक शांत विद्रोह था, जो जल्द ही एक वैचारिक ज्वालामुखी में बदलने वाला था।
1857 भारत के लिए क्रांति का साल था और इसी वर्ष केशव ने 'ब्रह्म समाज' की सदस्यता लेकर अपनी निजी क्रांति शुरू की। महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर (रवींद्रनाथ ठाकुर के पिता) ने इस प्रतिभाशाली युवक की क्षमता को तुरंत पहचान लिया।
उन्होंने केशव को अपना 'आध्यात्मिक पुत्र' माना और उन्हें समाज का 'आचार्य' नियुक्त किया। यह एक ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि केशव पहले गैर-ब्राह्मण थे जिन्हें यह प्रतिष्ठित पद मिला।
केशव के नेतृत्व में ब्रह्म समाज ड्राइंग रूम की चर्चाओं से निकलकर बंगाल की गलियों तक पहुंच गया। उन्होंने 'संगत सभा' बनाई जहां युवा सुधारों की शपथ लेते थे। लेकिन केशव की दृष्टि और भी व्यापक थी। वे हिंदू धर्म की जड़ता को मिटाने के लिए ईसा मसीह के नैतिक उपदेशों और पश्चिमी मिशनरी जोश को शामिल करना चाहते थे। इसी वैचारिक टकराव ने 1866 में ब्रह्म समाज का पहला विभाजन किया, जहां केशव ने 'भारतीय ब्रह्म समाज' की नींव रखी।
केशव चंद्र सेन केवल उपदेश देने वाले संत नहीं थे, वे एक समाज-सुधारक कार्यकर्ता थे। उन्होंने 'बामबोधिनी पत्रिका' निकाली ताकि ज्ञान का प्रकाश घरों में फैल सके। उनकी सबसे बड़ी जीत 'नेटिव मैरिज एक्ट' (1872) थी। उस समय, जब बाल विवाह सामान्य बात थी, केशव ने कानूनन लड़कियों के लिए 18 और लड़कों के लिए 21 वर्ष की न्यूनतम आयु तय करवाई। उन्होंने विधवा विवाह और अंतरजातीय विवाह का समर्थन किया। उन्होंने 'सुलभ समाचार' जैसा एक समाचार पत्र शुरू किया, ताकि एक गरीब किसान भी दुनिया की खबरों से अवगत हो सके।
1870 में केशव इंग्लैंड गए। जब एक 'दाढ़ी वाला भारतीय युवक' शुद्ध अंग्रेजी में ईसा मसीह के 'एशियाई' मूल पर भाषण देने लगे, तो अंग्रेज दंग रह गए। उनकी वक्तृत्व कला इतनी प्रभावशाली थी कि महारानी विक्टोरिया ने उन्हें व्यक्तिगत मुलाकात के लिए बुलाया। इंग्लैंड उन्हें एक 'आध्यात्मिक राजदूत' के रूप में देख रहा था। लेकिन केशव वहां के भौतिकवाद से प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने गर्व से कहा, "मैं यहाँ से और भी अधिक पुख्ता भारतीय होकर लौट रहा हूँ।"
केशव का जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने 1878 में अपनी 13 वर्षीय पुत्री का विवाह कूचबिहार के महाराजा से किया। आलोचकों ने इसे उनके स्वयं के 'विवाह कानून' का उल्लंघन बताया। केशव ने इसे 'ईश्वरीय आदेश' कहा, लेकिन इस घटना ने ब्रह्म समाज में दूसरा बड़ा विभाजन पैदा किया।
हार मानने के बजाय, केशव ने अपनी ऊर्जा 'नव विधान' के निर्माण में लगा दी। यह एक ऐसा 'विश्व धर्म' था जहां मंदिर का त्रिशूल, इस्लाम का अर्धचंद्र और ईसाई धर्म का क्रॉस एक ही झंडे के तले थे।
केशव चंद्र सेन के जीवन का सबसे सुंदर अध्याय दक्षिणेश्वर के संत रामकृष्ण परमहंस के साथ उनकी मित्रता थी। एक तरफ पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त तार्किक केशव, दूसरी तरफ सीधे-सादे ग्रामीण रहस्यवादी रामकृष्ण। इस मिलन ने केशव के भीतर 'भक्ति' का संचार किया। रामकृष्ण ही थे जिन्होंने केशव को ईश्वर में 'मां' के दर्शन कराए। यह केशव ही थे जिन्होंने पहली बार रामकृष्ण को कलकत्ता के शिक्षित वर्ग और स्वामी विवेकानंद (तब नरेंद्र) से परिचित कराया।
8 जनवरी 1884 को मात्र 45 वर्ष की आयु में केशव इस धरती से चले गए। उन्होंने आधुनिक भारत का वह नक्शा तैयार किया जिसमें तर्क और विश्वास, पूर्व और पश्चिम एक साथ चल सके।