क्या खालिदा जिया के शासनकाल में भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव रहा?
सारांश
Key Takeaways
- खालिदा जिया का शासन भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव का कारण बना।
- अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हिंसा की घटनाएं बढ़ीं।
- खालिदा जिया की बीएनपी पार्टी को भारत विरोधी माना गया।
- भारत ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में बड़ी भूमिका निभाई।
- शेख हसीना के सत्ता में आने से संबंधों में सुधार हुआ।
नई दिल्ली, 30 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की स्वास्थ्य स्थिति काफी चिंताजनक है। कई दिनों से वह ढाका के एक अस्पताल में भर्ती हैं और उनके लिए दुआओं का दौर जारी है। खालिदा जिया ने प्रधानमंत्री के रूप में पहला और तीसरा कार्यकाल पूरा किया, लेकिन दूसरे कार्यकाल के दौरान उन्हें कुछ ही महीनों में पद छोड़ना पड़ा। आइए जानते हैं कि खालिदा जिया के शासनकाल में भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध कैसे रहे।
खालिदा जिया के शासन में, भारत और बांग्लादेश के संबंधों में कई बार तनाव की स्थिति बनी।
पति की हत्या के बाद, खालिदा जिया ने फरवरी 1991 के आम चुनाव में जीतकर बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का गौरव हासिल किया। वह मार्च 1996 तक इस पद पर बनी रहीं। उनके दूसरे कार्यकाल की शुरुआत 19 फरवरी 1996 को हुई, लेकिन कुछ ही महीनों में तख्तापलट हो गया। उन्हें 15 फरवरी 1996 के आम चुनाव में धांधली का आरोप लगा।
इसके बाद, 2001 से 2006 तक उन्होंने तीसरे कार्यकाल की जिम्मेदारी संभाली। मार्च 2006 में वह तीन दिवसीय भारत यात्रा पर गई थीं। फिर 2012 में भी वह भारत आईं, जहां उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की। हालांकि, खालिदा की पार्टी बीएनपी को शुरुआत से ही भारत विरोधी माना जाता रहा है। 2001 के आम चुनाव में, बीएनपी ने भारत पर बांग्लादेश की राजनीति में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया और इसे चुनावी मुद्दा बना दिया।
तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी अवामी लीग के भारत के साथ अच्छे संबंध थे। जब पाकिस्तानी सेना बांग्लादेश के लोगों पर अत्याचार कर रही थी, तब भारत ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का समर्थन किया और हजारों लोगों को शरण दी।
खालिदा जिया के शासन में राजनीतिक और सांप्रदायिक तनाव भी देखने को मिला। 1992 में जब भारत में विवादित ढांचा गिराया गया, उस समय बांग्लादेश में भी हिंसा भड़की। कई जगहों पर हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले किए गए।
खालिदा की सरकार में चुनावी हिंसा भी देखने को मिली। 1994 और 1995 में, अवामी लीग समेत विपक्षी दलों ने निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए बड़े स्तर पर आंदोलन किया।
खालिदा के तीसरे कार्यकाल में भी हिंसा की घटनाएं हुईं, जिसमें अल्पसंख्यक हिंदुओं को निशाना बनाया गया। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन घटनाओं पर प्रतिक्रिया जाहिर की थी।
खालिदा के कार्यकाल में अवामी लीग और बीएनपी के बीच तनाव बना रहा। उनके कार्यकाल में सबसे बड़ी हिंसा तब भड़की, जब 17 अगस्त 2005 को 63 जिलों में 300 से ज्यादा जगहों पर बम धमाके हुए।
खालिदा जिया के शासन में अल्पसंख्यक हिंदुओं की दुर्दशा पर अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने कई रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें विशेष रूप से उन हिंदुओं को निशाना बनाया गया, जिन्होंने अवामी लीग को वोट दिए थे।
उनके पहले कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश सीमा पर झड़पें भी हुईं। अप्रैल 2001 में, मेघालय और असम सीमा पर झड़प में भारत के 16 जवान शहीद हुए। इसके बाद से दोनों देशों के बीच स्थिति तनावपूर्ण रही। हालांकि, शेख हसीना की सत्ता में वापसी के बाद संबंधों में सुधार हुआ।